पहाड़ों की कटिंग से बढ़ा भू-स्खलन का खतरा, आईआईटी मंडी में विदेशी विशेषज्ञों का खुलासा

हिमालय में लैंडस्लाइड का खतरा बढ़ता जा रहा है। वैश्विक विशेषज्ञ मानते हैं कि हिमाचल के पहाड़ मौत बांटने को आमदा हैं और समय रहते छेड़छाड़ बंद नहीं हुई, तो लैंडस्लाइड कम नहीं होगी।

आईआईटी मंडी में आयोजित लैंडस्लाइड रिस्क एस्सेमेंट एंड मेटीगेशन 2026 में विदेशी विशेषज्ञों के शोध से हडक़ंप मच गया है। पहाड़ों से जारी छेड़छाड़ के कारण हिमाचल प्रदेश में दरकते पहाड़ ही इनसानों के लिए जानलेवा हो गए हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर के टॉप विशेषज्ञों ने आईआईटी मंडी में चल रहे लैंडस्लाइड रिस्क एसेसमेंट एंड मेटिगेशन में खुलासा किया है कि लैंडस्लाइड का खतरा पहले से कहीं ज्यादा हो चुका है। क्लाइमेट चेंज, बेतहाशा सडक़-बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन और बदलते बारिश के पैटर्न ने पहाड़ों को कमजोर कर दिया है।

ऐसे में अब बारिश के साथ मौत का साया मंडराने लगा है। आईआईटी मंडी के प्रोफेसर केवी उदय ने कहा कि अब इनसान खुद ही अपनी मुसीबत का सबसे बड़ा कारण बन गया है।

सड़कों, फोरलेन हाई-वे और बिल्डिंग्स के लिए पहाड़ों की ढलानों को 10 से 12 मीटर तक काटा जा रहा है। पहले दो लेन सडक के लिए सिर्फ छह मीटर कटिंग होती थी।

आईआईटी मंडी के सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज एंड डिजास्टर रिडक्शन द्वारा आयोजित इस कोर्स में स्विट्जरलैंड, इटली, नॉर्वे और भारत के दस प्रतिष्ठित विशेषज्ञों सहित 40 चुनिंदा प्रतिभागियों को प्रशिक्षित किया गया है।

लैंडस्लाइड की सटीक भविष्यवाणी संभव नहीं

इटली के यूनिवर्सिटी ऑफ सालर्नो से आए प्रो. सबटिनो कुओमो और प्रो. सेट्टिमियो फेरलिसी ने बताया कि अब आधुनिक टेक्नोलॉजी से लैंडस्लाइड का खतरा पहले से ज्यादा अच्छे से आंका जा सकता है। रिमोट सेंसिंग, एआई, मशीन लर्निंग और एडवांस्ड कम्प्यूटर मॉडल्स से ढलानों का व्यवहार समझा
जा रहा है।

विशेषज्ञों का सरकारों को सुझाव

विशेषज्ञों ने सरकारों से मांग की है कि अब और इंतजार नहीं। वैज्ञानिक रिसर्च, हैजार्ड मैपिंग और सख्त नियमों को डिवेलपमेंट प्लानिंग में शामिल करें। हिमाचल जैसे हिमालयी इलाकों में बिना सोचे-समझे कंस्ट्रक्शन बंद हो, वरना आने वाले सालों में लैंडस्लाइड की तबाही और भयानक हो सकती।

हिमालय में भूकंप का खतरा बरकरार

मंडी। हिमालयन रिजन में भूकंप के बढ़ते खतरे के बीच भारतीय मानक ब्यूरो की ओर से जारी भूकंपयी मानचित्र को वापस ले लिया गया है। इसके लिए तीन मार्च को गजट नोटिफिकेशन जारी कर दी गई है। ऐसे में हिमालय रेंज में 2016 में जारी भूकंप मैप ही प्रभावी रहेगा और इसी के आधार पर विकास के काम और भवन निर्माण किया जाएगा।

इससे हिमाचल, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर से लेकर अरूणाचल के इलाकों में खतरा कम नहीं हुआ। बस ऑफिशियल मैप पुराना हो गया। भारत सरकार का नया भूकंपीय जोन छह का बम फट गया है। केंद्र सरकार ने इसे वापस ले लिया है, लेकिन इससे हिमालय में भूकंप का खतरा अब भी टाइम बम की तरह ही बना हुआ है।

भारतीय मानक ब्यूरो ने जारी किया नया मैप

यह मैप भारतीय मानक ब्यूरो ने बनाया और जारी किया। बीएसआई भारत सरकार के अंतर्गत आता है। यह आईएस 1893:2025 अर्थक्वेक डिजाइन कोड के तहत नया रिवाइज्ड वर्जन लाया था।

नवंबर 2025 में बीएसआई ने इसे नोटिफाई किया। पहली बार इसमें सबसे बडा रिस्क जोन छह जोड़ा गया और पूरे हिमालयी आर्क जम्मू-कश्मीर से लेकर अरुणाचल तक को इसमें डाल दिया।

भूमि के अंदर हो रही हलचल

भूकंप के नजरिए से हिमालय अब दुनिया के सबसे एक्टिव टेक्टॉनिक जोन में है। भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है। टकराने की स्पीड सालाना 5 सेमी है।

सेंट्रल हिमालय में 200 से 500 साल से कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है। जमीन के अंदर तनाव जमा हो रहा है, जो भूकंप की आठ तीव्रता की मेगा-क्वेक ट्रिगर कर सकता है।

नया मैप से सख्त होते बिल्डिंग कोड

नया मैप प्रभावी रहता तो बिल्डिंग कोड पहले के मुकाबले ज्यादा सख्त होता। इससे ज्यादा मजबूत निर्माण, रेट्रोफिटिंग, साइट स्पेसिफिक डिजाइन होता और इससे भविष्य में तबाही कम होने की संभावनाएं बढ़ जाती।

मैप वापस लेना भूकंप तैयारियों को करेगा कमजोर

नेशनल सेंटर फार सिस्मोलॉजिस्ट के पूर्व निदेशक वनीत कहते हैं कि यह मैप हिमालय में लंबे समय से लॉक फॉल्ट सेगमेंट्स की अंडरएस्टिमेशन को ठीक करता है। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस के सीपी राजेंद्रन मैप वापस लेने को बैकस्टेप बताते हैं।