175 साल पुराना है कांगड़ा चाय का इतिहास

हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा चाय के पहले बाग 1850 के आसपास कांगड़ा, पालमपुर, बैजनाथ, बीड़ व सिद्धबाड़ी इत्यादि में प्रयोगात्मक आधार पर लगाए गए थे। इसी कड़ी में बॉटेनीकल गार्डन के अधीक्षक डा. जेम्सन द्वारा पालमपुर में 1852 में हिली टी एस्टेट के नाम से एक चाय बागान की स्थापना की गई थी।

यह सारा कार्य ब्रिटिश सरकार द्वारा किया गया था। इसी दौरान यहां पर टी फेस्टिवल का आयोजन भी किया गया था तथा अफगानिस्तान के व्यापारियों के लिए यह प्रमुख चाय का बाजार बना। एक ब्रिटिश सेना के मेजर स्ट्राट ने 1866 में बागान को खरीदकर इसका नाम निशान टी एस्टेट रख दिया।

अंग्रेजी सेना के अधिकारियों ने पालमपुर के आसपास टी गार्डन लगाने शुरू कर दिए। अंग्रेजों द्वारा लगाया गया प्रत्येक चाय बागान का ब्लॉक पचास एकड़ का था इसके बाद चाय लगाने का प्रचलन पालमपुर में बढ़ गया। 1866 में लंदन की नीलामी में कांगड़ा चाय को गोल्ड मेडल प्राप्त हुआ।

इसके बाद 1892 से अंग्रेजों ने बागान बेचने शुरू कर दिए जिसके चलते एक साल में ही 613 एकड़ चाय बागानों के मालिक स्थानीय निवासी बन गए, चाय के व्यवसाय का यह उत्तम समय था।

1914 में विश्व युद्ध का समय चाय के ऊपर काल बनकर आया। जब अधिकतर कुशल लोग सेना में चले गए और चाय उद्योग अकुशल लोगों के हाथ आ गया। ‘फरंटियर‘ काली चाय जो कभी पूरे विश्व में प्रख्यात थी अंतरराष्ट्रीय बाजारों से लुप्त हो गई।

मंदी का दौर

1947 में पाकिस्तान बनने के कारण अफगानिस्तान का रास्ता बंद हो गया उसके बाद सोवियत संघ के विघटन के बाद चाय की मंदी का दौर शुरू हो गया। 1998 में सरकार ने डब्ल्यूटीओ से समझौता कर अन्य देशों की चाय भारतीय चाय बाजारों पर पहुंच गई।

एक समय था जब क्षेत्र में लगभग 4500 हेक्टेयर भूमि पर चाय बागानों की खुशबू महकती थी पर धीरे-धीरे चाय बागान कम होते गए और अब जहां मात्र 2300 हैक्टेयर पर चाय बागान रह गए हैं वहीं इसमें से लगभग एक हजार हेक्टेयर चाय बागान ही अच्छी हालत में बताए जाते हैं।

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