सबकी चिन्ता दूर करती है माँ चिंतपूर्णी

हिमाचल प्रदेश को देव भूमि के नाम से भी जाना जाता है.देवी -देवताओं की यह पावन भूमि स्थानीय और बाहरी श्रद्धालुओं को अनायास ही अपनी ओर आकर्षित करती है.

सोलह सिंगी पहाड़ी में स्थित है माँ का दरबार

हिमाचल प्रदेश में कई देवी देवताओं के मंदिर हैं जहाँ हर रोज हज़ारों श्रद्धालु अपना शीश नवाते हैं तथा आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. ऐसा ही एक मंदिर सोलह सिंगी श्रेणी की पहाड़ी में जिला ऊना के चिंतपूर्णी नामक स्थान में स्थित है जिसे माँ चिंतपूर्णी धाम के नाम से जाना जाता है. माँ का यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के प्रमुख धार्मिक स्थलो में से एक है.

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मंदिर से जुडी है पौराणिक कथा

चिंतपूर्णी मंदिर शक्ति पीठ मंदिरों मे से एक है. पूरे भारतवर्ष मे कुल 51 शक्तिपीठ हैं. जिन सभी की उत्पति कथा एक ही है. यह सभी मंदिर शिव और शक्ति से जुड़े हुऐ हैं. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इन सभी स्थलों पर देवी के अंग गिर थे. शिव के ससुर राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया जिसमे उन्होंने शिव और सती को आमंत्रित नही किया क्योंकि वह शिव को अपने बराबर का नही समझते थे. यह बात सती को काफी बुरी लगी. वह बिना बुलाए यज्ञ में पहुंच गयीं. जहां शिव का काफी अपमान किया गया. इसे सती सहन न कर सकी और वह हवन कुण्ड में कूद गई.

माँ सती के चरण गिरे थे यहाँ

जब भगवान शंकर को यह बात पता चली तो वह आये और सती के शरीर को हवन कुण्ड से निकाल कर तांडव करने लगे. जिस कारण सारे ब्रह्माण्‍ड में हाहाकार मच गया. पूरे ब्रह्माण्‍ड को इस संकट से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर के अपने सुदर्शन चक्र से 51 भागो में बांट दिया. जो अंग जहां पर गिरा वह शक्ति पीठ बन गया.

मान्यता है कि चिंतपूर्णी नामक इस धार्मिक स्थल में माता सती के चरण गिरे थे. इन्‍हें छिनमष्तिका देवी भी कहा जाता है. चिंतपूर्णी देवी मंदिर के चारों ओर भगवान शंकर के मंदिर हैं.

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