इस मंदिर में चढ़ाए जाते हैं गाड़ियों के पुर्जे !!

मंडी : यूं तो आपने मंदिर में अमूमन धूप जलाकर प्रसाद के रूप में कोई मिठाई, नारियल या फल ही चढ़ाए होंगे। लेकिन आज हम आपको जिस मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं उसमें ऐसा कुछ नहीं चढ़ाया जाता। यहां चढ़ाए जाते हैं गाड़ियों के पुर्जे, नंबर प्लेट और घर के पुराने औजार। आप भी जानिए इस अनोखे मंदिर के बारे में।

सराज में है यह मंदिर

यह मामला है मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के गृहक्षेत्र सराज का। यह क्षेत्र काफी दुर्गम भी है और देव संस्कृति को लेकर काफी प्रसिद्ध भी। इसी क्षेत्र में मगरूगला नामक स्थान के पास है देवता बनशीरा का मंदिर। देवता बनशीरा को जंगल का देवता कहा जाता है और यही कारण है कि इनका मंदिर जंगल के बीचों बीच स्थित है।

न छत है न पुजारी

इस मंदिर की न तो कोई छत है और न यहां कोई पुजारी मिलता है। लेकिन मान्यता मंदिर की मिलों दूर तक है। मगरू महादेव मंदिर के पुजारी हेतराम बताते हैं कि देवता के इतिहास के तो कोई प्रमाण नहीं लेकिन देवता सदियों से इसी स्थान पर विराजमान है और इसे जंगल का देवता कहा जाता है।

पहले चढ़ाते थे पुराने औज़ार

हेतराम बताते हैं कि यदि लोग प्राचीन समय से ही मंदिर में अपने घरों के पुराने औजार देवता के मंदिर में चढ़ाते थे और समय के साथ-साथ इसमें गाड़ियों के पुर्जे और नम्बर प्लेट भी शामिल हो गई। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से उस वस्तु पर देवता की कृपा दृष्टि बनी रहती है और कोई संकट नहीं आता। मंदिर परिसर में पड़े ढेरों पुर्जे और नम्बर प्लेट इस बात की तरफ इशारा कर रही हैं कि वाहन चालकों की इस मंदिर के प्रति कितनी प्रगाड़ आस्था है।

चालकों में है गहरी आस्था

यहां से गुजरने वाले वाहन चालक मंदिर के आगे अपनी गाड़ी को ब्रेक जरूर लगाते हैं और माथा टेककर आशीवार्द प्राप्त करते हैं। टैक्सी चालक खेम सिंह यादव बताते हैं कि यदि गाड़ी का कोई पुर्जा बार-बार खराब हो और उसे इस मंदिर में चढ़ाया जाए तो फिर वह पुर्जा खराब नहीं होता। वहीं गाड़ियों की नम्बर प्लेट इसलिए चढ़ाई जाती हैं ताकि देवता की कृपा गाड़ी पर बनी रहे।

देवभूमि की है अलग पहचान

हालांकि इन बातों पर यकीन करना संभव नहीं लगता लेकिन यह लोगों की आस्था ही है जो इस बात का दर्शा रही है कि मंदिर के प्रति उनकी कितनी अटूट श्रद्धा है। यह आस्था इस बात का प्रमाण है कि विभिन्न प्रकार के मंदिर और उनकी अपनी विशेष प्रकार की मान्यताओं के कारण ही हिमाचल प्रदेश का देवभूमि कहा जाता है।

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