हिमाचल प्रदेश के हिमालयी क्षेत्र वर्तमान में गंभीर जलवायु संक्रमण काल से गुजर रहे हैं। बढ़ते तापमान के कारण हिमनद (ग्लेशियर) तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे ‘ग्लेशियल लेक आउटब्रस्ट फ्लड’ यानी हिमनदीय झीलों के फटने का खतरा बढ़ गया है।
यह चेतावनी वल्लभ राजकीय महाविद्यालय, मंडी के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभागाध्यक्ष फ्लाइंग ऑफिसर डा. चमन ने नाहन में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान दी।
डा. चमन ने डा. यशवंत सिंह परमार महाविद्यालय नाहन में आयोजित हिमालय के पर्यावरणीय मुद्दे व आपदा जोखिम: बहुविषयक दृष्टिकोण विषय पर अपना शोध-पत्र ऑनलाइन माध्यम से प्रस्तुत किया।
उन्होंने अपने शोध हिमाचल हिमालय में त्रासदी जोखिम न्यूनीकरण हेतु उपग्रह-आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली में खुलासा किया कि प्रदेश की चार प्रमुख झीलें-वसुकि (कुल्लू), घेपन (लाहुल-स्पीति), बसपा (किन्नौर) और कालक (किन्नौर)-वर्तमान में उच्च जोखिम श्रेणी में हैं।
ये झीलें चिनाब, पार्वती और सतलुज नदी घाटियों के तटीय क्षेत्रों के लिए विनाशकारी साबित हो सकती हैं। संगोष्ठी के सफल आयोजन पर डा. चमन ने ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी डा. जगदीश चंद और प्राचार्य डा. वीके शुक्ला का आभार व्यक्त किया। मंडी कॉलेज के प्राचार्य डा. संजीव कुमार ने डा. चमन को इस अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि पर बधाई दी है।
ये है प्रमुख अनुशंसाएं
जीआईएस मैपिंग-जोखिम वाले क्षेत्रों का भौगोलिक सूचना प्रणाली आधारित मानचित्रण, टेलीमेट्री तंत्र-स्वचालित जल-स्तर रिकॉर्डर और वास्तविक समय अलर्ट प्रणाली। संस्थागत समन्वय- मौसम विभाग और आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के बीच बेहतर तालमेल। नीतिगत पहल- जलविद्युत परियोजनाओं का विनियमन और स्थानीय समुदायों का प्रशिक्षण।
क्या है ‘ग्लेशियल लेक आउटब्रस्ट फ्लड
जब पहाड़ों पर ग्लेशियर पिघलते हैं, तो वे अपने पीछे मलबे और बर्फ से घिरे प्राकृतिक बांध बना लेते हैं, जिनमें पानी जमा होकर झील का रूप ले लेता है। तापमान बढऩे या भूकंप आने पर जब ये कमजोर प्राकृतिक बांध टूटते हैं, तो लाखों गैलन पानी अचानक निचले इलाकों की ओर बह निकलता है। इसे ही जीएलओएफ कहा जाता है।
एनडीएमए के आंकड़े
भारतीय हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण एक बड़ा संकट दस्तक दे रहा है। शोध के चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, हिमालय में स्थित 7,500 से अधिक हिमनद झीलों में से 195 झीलें ‘अत्यंत खतरनाक’ श्रेणी में पहचान की गई हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ये झीलें भविष्य में किसी भी समय बाढ़ का कारण बन सकती हैं।
हिमालयी क्रायोस्फीयर निगरानी केंद्र स्थातिप करने का सुझाव
शोध में हिमालय को तृतीय ध्रुव और एशिया का जल टावर बताते हुए डा. चमन ने कहा कि मानवीय हस्तक्षेप और ग्लोबल वार्र्मिंग के कारण हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं।
उन्होंने प्रदेश सरकार को हिमालयी क्रायोस्फीयर निगरानी केंद्र स्थापित करने का सुझाव दिया, ताकि ग्लेशियरों और झीलों की निरंतर निगरानी की जा सके।
डा. चमन ने जोखिम संप्रेषण में मीडिया की भूमिका को महत्त्वपूर्ण बताते हुए कहा कि केवल तकनीक पर्याप्त नहीं है। सामुदायिक रेडियो, मोबाइल अलर्ट और पर्यावरण पत्रकारिता के माध्यम से अंतिम व्यक्ति तक सूचना पहुंचाना अनिवार्य है।































