बीस भादों स्नान पर्व मनाने का है पौराणिक महत्त्व

जोगिन्दरनगर : आज के दिन बीस भादों के अवसर पर पवित्र स्थानों में महास्नान का विशेष महत्व होता है. क्षेत्र के प्रसिद्ध तीर्थस्थलों नागचला ,बनाड़,हिमरी गंगा,डेहनासर झील,पराशर झील आदि जगहों में आज के दिन पवित्र स्नान के लिए हजारों श्रद्धालु श्रद्धा की डुबकी लगाते हैं लेकिन इस बार इन सभी स्थानों में कोरोना महामारी के चलते स्नान व मेलों के आयोजन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है.

 

 

 

 

 

 

 

 

बीस भादों के स्नान पर्व मनाने के पीछे पौराणिक महत्व है। यह पर्व रामायण काल की याद दिलाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार उन्नीस भादो रात को हनुमान मूर्छित पड़े हुए लक्ष्मण को बचाने के लिए संजीवनी जड़ी-बूटी लाने आए थे। पहाड़ों की सभी जड़ी-बूटियां रोशनी से जगमगाने लगी। संजीवनी बूटी की खासियत यह थी कि वह रात को चमकती थी।

जबकि हनुमान के सामने पहाड़ों की सारी जड़ी बूटी चमकने व रोशनी देने लगी। उन्नीस भादों की रात को सारी जड़ी-बूटियां रोशनी से जगमगती हैं और इनका प्रभाव भू गर्भ पर जाकर पानी में भी पड़ता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बीस भादो के दिन रोशनी युक्त जड़ी बूटियों का मिश्रित जल के स्नान करने से हर रोगों से मुक्ति मिलती है। यह पर्व सदियों पूर्व से मनाया जाता आ राह है। बीस भादो के स्नान का जिला कुल्लू में अति विशेष महत्व है।

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