भारतीय नारी के अखण्ड सुहाग का प्रतीक व्रत : करवा चौथ

इस बार “करवा चौथ” का व्रत पूरे भारतवर्ष में 08 अक्तूबर रविवार के दिन मनाया जा रहा है. भारतीय नारी के लिए “करवा चौथ” का व्रत अखण्ड सुहाग को देने वाला माना गया है.

पति की दीर्घायु का प्रतीक है व्रत

वास्तव में करवा चौथ का व्रत-त्यौहार भारतीय संस्कृति के उस पवित्र बंधन का प्रतीक है जो पति-पत्नी के बीच होता है. इस दिन स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु एवं स्वास्थ्य की मंगल कामना करके चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित कर व्रत को पूर्ण करती हैं.

इस व्रत के प्रति महिलाओं में होता है श्रद्धा भाव

स्त्रियों में इस दिन के प्रति इतना श्रद्धा भाव होता है कि वे कई दिन पहले ही इस व्रत की तैयारियां शुरू कर देती हैं. इस दिन स्त्रियाँ खूब सजती संवरती हैं और भगवान से दिन भर के व्रत के बाद यह प्रण भी लेतीं हैं कि वे पति के प्रति मन, वचन, कर्म से पूर्ण तौर पर समपर्ण की भावना रखेंगी.

कुँवारी कन्यायें भी करती हैं व्रत

इस दिन शिव-पार्वती और स्वामी कार्तिकेय को भी पूजा जाता है. इसके अलावा कुंवारी कन्याओं और विवाहित स्त्रियों के लिए गौरी पूजन का विशेष महत्व माना जाता है.

सूर्योदय से पहले लिया जाता है संकल्प

इस तरह करवा चौथ का व्रत पति की दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है. करवा चौथ का यह व्रत प्रथम रात्रि से ही मनाना प्रारम्भ हो जाता है. स्त्रियाँ सुबह -सुबह सूर्योदय से पहले व्रत का संकल्प लेती हैं और घरों में पूरा दिन स्वादिष्ट पकवान बनते हैं और महिलाएं श्रृंगार करती हैं.

कथा के बाद होता है चाँद का दीदार

शाम को कथा समाप्त होने के पश्चात चंद्रमा के उदय होते ही छननी में दिया रखकर चंद्रमा के दर्शन करती हैं और उन्हें चावल चढ़ाती हैं और फिर उसमें से अपने पति का मुख देखती हैं और उनकी आरती उतारती हैं तथा उन्हें माथे पर टीका लगाने के बाद उन्हें पैर छूकर प्रणाम करती हैं तथा उसके पश्चात पति अपनी पत्नी को पानी पिलाते हैं और उनका व्रत सम्पूर्ण करवाते हैं. इस प्रकार इस व्रत की समाप्ति होती है.

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