मच्छयाल

जोगिन्दरनगर शहर से आठ किलोमीटर दूर एक पवित्र झील है जो मछलियों के देवता मछिन्द्र नाथ को समर्पित है. यह पवित्र झील मच्छयाल के नाम से जानी जाती है. इस झील में मछलियों को ख़ासकर शनिवार,रविवार और मंगलवार को खाना खिलाया जाता है और पूजा भी की जाती है.यहाँ मछली मारना बिल्कुल प्रतिबंधित है.

भारतीय देसी महीने बैसाख में यहाँ मेला लगता है.मेला तीन दिन तक चलता है और आसपास के गाँव के लोग यहाँ मेले का आनन्द उठाने आते हैं तथा ख़ुशी से झूम उठते हैं.मेले में कई प्रकार की खेलों का आयोजन होता है.मेले का मुख्य आकर्षण कुश्ती होती है जिसका फाइनल मुकाबला मेले के अंतिम दिन होता है. जिले के, स्थानीय व बाहरी राज्यों के पहलवान भी अपना दमखम दिखाने यहाँ आते हैं और आकर्षक इनाम जीत कर जाते हैं.

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बस्सी पन बिजली परियोजना में इस्तेमाल उहल नदी का पानी, रणा खड्ड, गुगली खड्ड का पानी मच्छयाल के पास मिलता है और एक छोटी नदी लूणी का रूप ले लेता है. मछलियों के भगवान का एक बहुत ही सुन्दर मन्दिर झील की ऊपर की तरफ है. एक और झील जोकि इस पवित्र झील से डेढ़ किलोमीटर दूर है 200 मीटर लम्बी और 20 से 50 मीटर चौड़ी है.यहाँ हजारों की संख्या में महाशीर मछलियाँ हैं. भारत का पहला महाशीर फार्म यहाँ से दस किलोमीटर दूर उपरली मच्छयाल में प्रस्तावित था लेकिन अब वह मच्छयाल से डेढ़ दो किलोमीटर की दूरी पर लूणी खड्ड में बनाया गया है.

आसपास के लोगों के लिए मच्छयाल एक पवित्र स्थान है. प्राचीन समय में लोग यहाँ अपनी मन्नतें मांगने आते थे और मन्नत पूरी होने पर मछिन्द्र देवता को कुछ आभूषण भेंट कर जाते थे.कई बार लोग मछली के नाक में छल्ला पहना देते थे. इसी प्रकार का सोने का छल्ला एक महाशीर मछली के नाक में लगभग 15-20 वर्ष पहले इसी झील में देखा गया था.आजकल यह परम्परा लगभग विलुप्त हो चुकी है.लेकिन फिर भी महाशीर मछली को आज भी आटा खिलाया जाता है चाहे ख़ुशी के सन्दर्भ में हो या अच्छे भाग्य की कामना की बात हो.

सन 2000 के शुरुआत में कुछ शरारती तत्वों ने रणा और गुगली खड्ड में कुछ जहरीली वस्तु मिला दी थी जिस कारण कई पवित्र मछलियाँ मच्छयाल झील में मृत पाई गई थी. मच्छयाल देवता के प्रति अपनी श्रद्धा दिखाते हुए श्रद्धालुओं ने कई मछलियों को जमीन में दबा दिया था और लोगों में इस घृणित कार्य के लिए शरारती तत्वों के प्रति गुस्सा और असंतोष था.

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