गुग्गा जाहरवीर कथा-गाथा यात्रा संपन्न – पढ़ें कथा व इतिहास

जोगिन्दरनगर: हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी जोगिन्दरनगर उपमंडल के तहत मण्डली द्वारा घर-घर गूगा गाथा सुनाई गई। ग़ौरतलब है कि रक्षा बंधन से लेकर जन्माष्टमी तक गुग्गा जाहरवीर की कथा घर-घर गूगा गा कर सुनाई जाती है।

जय हो गूगा महाराज की

 

रक्षाबंधन से लेकर जन्माष्टमी के दिन तक गुग्गा जाहरवीर के मंडलीदार गुग्गा जाहरवीर के संकेत छतरी के साथ गाँव में घर-घर जाकर लोगों के सुखमयी जीवन की कामना करते हैं. लोग श्रद्धा से उनकी छतरी पर डोरियाँ, चूड़ियाँ, श्रृंगार का सामान, कपड़े की कतरने आदि बाँध कर मंगल की कामना करते हैं.

 

गुग्गा जाहरवीर को राजा छतरी जाहरवीर के नाम से भी जाना जाता है. लोकमान्यता व लोककथाओं के अनुसार गुग्गाजी को साँपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। लोग उन्हें गोगाजी, गुग्गा, जाहर वीर व जाहर पीर, जाहरवीर के नामों से पुकारते हैं।

यह गूगा गाथा घर-घर क्यों सुनाई जाती है, और इसे सुनने और सुनाने से क्या होता है, इसके पीछे एक बहुत ही रोचक कहानी है.

कथा सुनने से कष्ट होते हैं दूर

गुरू गोरखनाथ के आशिर्वाद से राजा गुग्गामल महा-वीर, नागों को वश में करने वाले तथा सिद्धों के शिरोमणि हुए. उनके मन्त्र के जाप से वासुकी जैसे महानाग के विष का प्रभाव भी शांत हो गया था. कहते हैं इनकी कथा सुनने से सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है. साथ ही सर्पभय से भी मुक्ति मिलती है.

गुरु गोरखनाथ के थे शिष्य

गुग्गा जाहरवीर गुरु गोरखनाथ के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। राजस्थान के छह सिद्धों में गुग्गाजी को समय की दृष्टि से प्रथम माना गया है।

बाछ्ल के गर्भ से हुआ था जन्म

गोगाजी का जन्म राजस्थान के ददरेवा (चुरू) चौहान वंश के शासक जैबर (जेवरसिंह) की पत्नी बाछल के गर्भ से गुरु गोरखनाथ के वरदान से भादो सुदी नवमी को हुआ था। चौहान वंश में राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद गोगाजी गुरुभक्त, वीर योद्धा ओ‍र प्रतापी राजा थे।

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निसंतान थी बाछल

गोगाजी की माँ बाछल देवी निःसंतान थी। संतान प्राप्ति के सभी यत्न करने के बाद भी संतान सुख नहीं मिला। गुरू गोरखनाथ ‘गोगामेडी’ के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी शरण मे गईं तथा गुरू गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई और तदुपरांत गोगाजी का जन्म हुआ। गुगल फल के नाम से इनका नाम गुग्गामल पड़ा।

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हिमाचल में होती है गूगा गाथा

पंजाब और हरियाणा समेत हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में इस पर्व को बहुत श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है. गुग्गा नवमी की ऐसी मान्यता है पूजा स्थल की मिट्टी को घर पर रखने से सर्प भय से मुक्ति मिलती है.

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डिभणु और सकमांद में है गूगा मंदिर

जोगिन्दरनगर क्षेत्र के डिभणु गाँव के पास और कुराटी के सकमांद गाँव व टिकरू के भजकैड़ा गाँव में गुग्गा के मंदिर हैं. मंडलीदार पूर्ण सिंह और धनी राम गाँव भचकैड़ा का कहना है कि लोग पुरानी संस्कृति को भूलते जा रहे है. पुरानी धरोहर को कायम रखने के लिए सरकार को पग उठाने चाहिए ताकि पुरानी धरोहर कायम रह सके. क्षेत्र में राजा छतरी जाहरपीर की सेवा श्रद्धा विश्वास व पूरी लग्न के साथ आठ दिन तक मंडलीदारों द्वारा की जाती है.

मण्डली सुनाती है गूगा गाथा

मंडी जिला में आजकल घर-घर जाकर गुग्गा मंडली के सदस्यों द्वारा जाकर गूगा भगवान का गुणगान किया जा रहा है. गुग्गा मंडली के सदस्यों द्वारा नगें पांव हाथों में छत्र लेकर घर- घर घूम कर कथाएं सुनाई जा रही हैं.

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पुराणों के अनुसार रक्षा बंधन से आगामी सात दिनों तक गुग्गा की कथाएं सुनने से सुख मिलता है और दुख व कष्ट दूर होते हैं. गुग्गा की इस कथा के गुणगान का यह क्रम जन्माष्टमी के अगले दिन नवमी को समाप्त होता है.

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