भक्तों की आस्था का केंद्र है जोगिन्दरनगर में स्थित बाबा बालकरूपी मंदिर

जोगिन्दरनगर : हिमाचल प्रदेश देवभूमि जो सैलानियों के लिए अतीव सुंदरता का जीवंत व सजीव चित्रण पेश करता है, जिसे निहारने के लिए पर्यटकों का सैलाब इस देवभूमि की ओर प्रतिवर्ष उमड़ता है। राज्य की समूची देवभूमि देव तुल्य है, जहां देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों ने  तपस्या की थी।

भक्तों की आस्था का केंद्र है जोगिन्दरनगर में स्थित बाबा बालकरूपी मंदिर

समृद्ध संस्कृति

वैसे भी इस देवभूमि की पहचान उसकी प्राचीन देव संस्कृति, आस्था और समृद्ध परंपराओं से जुड़ी हुई है। इसलिए यहां के प्राचीन व ऐतिहासिक मंदिर और पर्यटन स्थल हरेक को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

इस शांतप्रिय राज्य की बर्फ से लकदक चांदी सरीखी गगनचुंबी पर्वतमालाएं तथा हरे-भरे खेत-खलिहानों के कुदरती विहंगम दृश्य किसी चित्रकार द्वारा उकेरी गई कल्पना जैसे प्रतीत होते हैं।

आस्था का केंद्र

इसी श्रृंखला में जोगिन्दरनगर मुख्य शहर से कुछ ही दूरी पर बालकरूपी गांव में अवस्थित बाबा बालकरूपी का प्राचीन मंदिर लोगों की आस्था व विश्वास से जुड़ा हुआ है।

वैसे भी समस्त जोगिन्दरनगर आस्था, विश्वास और अनुपम पर्यटन की दृष्टि से काफी महत्त्व रखता है और यहां के अनछुए नैसर्गिक सौंदर्य के नयनाभिराम और विहंगम दृश्यों को देखकर पर्यटकों को अनंत सुकून मिलता है।

फलीभूत होती है मुराद

यह स्थल रमणीय होने के कारण यहां की आबोहवा बहुत अच्छी व स्वास्थ्यवर्धक है। मान्यता है कि मंदिर में विराजमान बाबा बालकरूपी के समक्ष भक्तजनों द्वारा हृदय तल से मांगी गई हर मुराद यहां सदैव फलीभूत होती है।

मंदिर की है रोचक कहानी

इस मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक बड़ी ही रोचक कहानी है कि जोगिंद्र नगर के कस गांव की एक महिला जिला कांगड़ा के आलमपुर स्थित बाबा बालकरूपी मंदिर में निर्बाध आकर उनके आगे सच्ची श्रद्धा से अपना शीश नवाया करती थी।

जनश्रुति अनुसार जो भी कामना उनके समक्ष रखती, उसे बाबा शिरोधार्य कर उसकी झोली हमेशा भर देते थे। महिला नियमित रूप से मीलों दूर का सफर तय कर बाबा के दर्शनार्थ उनके दरबार में उपस्थित होकर सच्ची श्रद्धा व निष्ठा के साथ हाजिरी लगाती रहती थी।

समय का चक्र चलता रहा और महिला का आवागमन का क्रम भी यथावत बना रहा। समयानुसार महिला वृद्धावस्था के पड़ाव पर पहुंच गई और जब वे जीर्णशीर्ण शरीर के होते बाबा बालकरूपी पहुंची, तो उसने बाबाजी के समक्ष प्रार्थना की कि हे बाबा अब मैं वृद्ध हो चुकी हूं और मेरा शरीर आपके दरबार में आने के लिए असमर्थ होता जा रहा है।

अत: अपनी असमर्थता जाहिर करते हुए बाबा के प्रति निष्ठाभाव से समर्पित वृद्ध महिला ने उस रोज रात बाबा का अंतध्र्यान करते हुए उसी मंदिर में गुजारी।

बाबा ने दिया स्वपन

किंवदंतियों के अनुसार वृद्धा की भक्ति से प्रसन्न होकर बाबा उसके स्वप्न में आए और वृद्धा को कहा कि जब भी उसकी निद्रा खुले तो मंदिर के इर्द-गिर्द किसी भी एक पत्थर को उठा ले और उसे अपने साथ अपने घर ले जाए। लेकिन, ख्याल रहे कि किसी भी सूरत में पत्थर को जमीन पर नहीं रखना।

उस पत्थर को तुम जहां भी रखोगी, वहीं पर मैं स्थापित हो जाऊंगा। वृद्धा सुबह उठी तो बाबा के रात्रि स्वप्न के आदेशानुसार मंदिर के बाहर से उसने एक पत्थर उठाया और बाबा जी का ध्यान सिमरन करती हुई अपने घर की ओर वापस लौट चली।

कहा जाता है कि जैसे ही वह अपने घर के नजदीक पहुंचने वाली थी कि उसे बड़ी असहनीय लघुशंका आई और विवशता पूर्वक वृद्धा ने उस दिव्य पत्थर को जमीन पर रख दिया।

जैसे ही पत्थर को जमीन पर रखा, बाबा वहीं पर साक्षात रूप में प्रकट होकर स्थापित हो गए। जिस स्थान पर बाबा स्थापित हुए वह गांव आगे चलकर बाबा बालकरूपी के नाम से प्रचलित हो गया और यह स्थान लोगों की आस्था व श्रद्धा का केंद्र बन गया।

बालकरूपी की अलौकिक मूर्ति

लोग बाबा बालकरूपी को अपने कुल देवता के रूप में पूजने लगे और यह प्रथा वर्षों से निरंतर चली आ रही है। मुख्य मंदिर के अंदर स्थापित बाबा बालकरूपी की अलौकिक मूर्ति दिव्यता का अनुभव कराती है। मंदिर के बाहर नंदीजी की विशाल प्रतिमा के दर्शन कर श्रद्धालु आत्मविभोर हो जाते हैं।

बाबा भूतनाथ मंदिर

बाबा बालकरूपी मंदिर से कुछ ही दूरी पर बाबा भूतनाथ का अलौकिक मंदिर भी है। मान्यता है कि बाबा बालकरूपी मंदिर में माथा टेकने के उपरांत अपनी मनवांछित मनोकामना के लिए यहां शीश नवाना परम अवश्य माना जाता है। बाबा भूतनाथ की इस प्रतिमा पर भक्तजनों द्वारा हल्दी का लेप किया जाता है।

मान्यता है कि अगर कोई व्यक्ति किसी चर्मरोग से ग्रसित है तो बाबा भूतनाथ को समर्पित यह हल्दी का लेप शरीर में लगाने से पुराने से पुराने चर्मरोग से छुटकारा मिल जाता है।

ऐसा अद्भुत व दिव्य चमत्कार है बाबा भूतनाथजी का। मंदिर में भारी मेले का आयोजन भी होता है, जिसमें दूर-दराज से आए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता है और सभी मेले का लुत्फ उठाते हुए नजर आते हैं।

ऐसे पहुंचें

बालकरूपी मंदिर में पहुंचने के लिए मुख्य जोगिन्दरनगर से टैक्सी-ऑटो व बस के माध्यम से पहुंचा जा सकता है, वहीं पठानकोट से जोगिन्दरनगर तक रेलगाड़ी से भी प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेते हुए पहुंचा जा सकता है।

जय बाबा बालकरूपी

होम

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *