विजय कुमार के गाँव हरसौर में जश्न का माहौल

हरसौर से लन्दन तक

हिमालय की तलहटी में बसे हरसौर गांव में पले-बढे विजय कुमार के लिए शूटिंग क्षितिज पर कहीं नहीं था. निकटतम शूटिंग रेंज 500 किमी दूर थी. हरसौर से लंदन के लिए यात्रा और भी लम्बी थी. आठ साल की इस दुर्गम यात्रा का सुखद समापन आखिरकार लन्दन में रजत पदक के साथ हुआ.

विजय ने पहली बार 18 साल की उम्र में पिस्तौल उठाई जब वह सेना में भर्ती हुए. वह और अधिक लोकप्रिय राइफल चुन सकते थे परन्तु उन्होंने पिस्तोल को चुना. वह एक ऐसा हथियार चाहते थे जिससे वह आसानी से लंबे समय अभ्यास कर सकें.

पिता बांकू राम की ख़ुशी का ठिकाना नहीं

पदक जीतने पर विजय के पिता सूबेदार बांकू राम बेहद खुश थे। हालांकि उन्हें गोल्ड मैडल जीतने का सुबह से ही भरोसा लग रहा था। लेकिन तीन अंकों से पिछडऩे के बाद सिल्वर मेडल मिलने पर वे बोल उठे यह मेडल गोल्ड से कम नहीं है। विजय ने दुनिया भर में जो नाम इलाके का रोशन किया है, उससे परिवार बेहद खुश है। वह शूटिंग में मैडल जीतने का यह काम लगातार करता रहेगा, ऐसी मेरी दुआ है। बांकू राम ने कहा कि जिस परिवार में उनके बेटे ने कभी बंदूक नहीं देखी, पिस्टल नहीं चलाई, यहां तक की खिलौने खेलने का भी शौक नहीं था, वह अंतरराष्ट्रीय स्तर का ऐसा निशानेबाज बनेगा, ऐसा सोचा भी नहीं था।

श्री बांकू राम ने बताया कि 25 मीटर रैपिड फायर पिस्टल स्पर्धा के फाइनल में जाने से पहले उनके बेटे ने उन्हें एक पदक का वादा किया था जो की उन्होंने (विजय ने) पूरा कर दिया. उनके अनुसार, “मैंने फाइनल से पहले उससे बात की और वह शांत लग रहा था. उसने मुझसे कहा कि वह आज एक पदक जीतेगा. वह यकीन के साथ नहीं कह सकता था की कौन सा पदक पर वह सुनिश्चित था कि वह एक पदक अवश्य जीतेगा. उसकी कड़ी मेहनत आखिर रंग लायी. मुझे यकीन था कि वह पदक लाएगा. एक पिता होने के नाते मैंने कभी नहीं सोचा था कि वह इस स्तर पर पहुंचेगा. मेरी ख़ुशी की कोई सीमा नहीं है.”

मां और दादी के आंखें में उमड़े खुशी के आंसू

विजय की दादी ब्रह्मी देवी की खुशी देखते ही बनती थी। वह सब को लड्डू और मिठाइयां खिलाते हुए जोर से बोल उठीं कि अब मेरे लाड़ले की शादी बहुत जल्द हो जाएगी। लंबे समय से मैं उसके मैडल की इंतजार में थी। ब्रह्मी देवी का कहना था कि आज उन्हें बेहद खुशी मिली है। उनके पोते ने वो कर दिखाया है, जिसकी उन्हें कभी उम्मीद तक नहीं थी। वे कह रही थीं कि गरीबी के वो दिन भी उन्होंने देखे हैं, जब उनका बेटा बांकू राम फौज में भर्ती नहीं हुआ था, लेकिन अब उनके दिन इस कदर भगवान ने फेरे हैं, जब चारों तरफ खुशियां ही खुशियां हैं। विजय की मां रोशनी देवी की आंखों से खुशी के आंसू टपक रहे थे।

जश्न का माहौल

विजय की इस उपलब्धि पर पूरा परिवार और पड़ोसी गदगद हैं। पटाखे फोड़े जा रहे थे और पूरा परिवार खुशी से झूम रहा था। लड्डू बांटे जा रहे थे। विजय के पिता सूबेदार बांकू राम को फोन पर बधाइयां देने का सिलसिला जारी था। जैसे ही आखिरी राउंड के निशाने में केवल तीन अंक पीछे रहे विजय के 30 प्वांइट्स बने, घर के बाहर दुकान पर टीवी देख रहे उनका पूरा परिवार झूम गया। महिलाएं भंगड़ा डाल रही थीं।

सराहना और इनाम

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने विजय को इस सराहनीय उपलब्धि के लिए 1 करोड़ रुपये का इनाम की घोषणा की है. भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने विजय कुमार और उनके परिवार को उनकी इस उपलब्धि पर बधाई दी है.

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