इस व्रत के चलते मंडी में रौनक़ – पंचभीष्म व्रत कथा

मंडी।। पांच दिन तक चलने वाले तुलसी पूजा और पंचभीष्म व्रत के लिए पूजा सामग्री को लेकर मंडी शहर में दूर दराज से ग्रामीण महिलाएं पहुंचना शुरु हो गई हैं। इस पर्व के चलते छोटी काशी मंडी के बाजार में खूब रौनक है। इस पर्व को लेकर महिलाओं ने गुरुवार से पूजा की सामग्री की खरीद-दारी की।

मंडी शहर में पूजा की सामग्री बेचने आई ग्रामीण महिलाओं ने बताया कि पंचभीष्म व्रत की परंपरा धीरे धीरे समाप्त होने वाली है। क्योंकि नई पीढ़ी को इसके बारे में जानकारी ही नहीं है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

क्या है पंचभीष्म व्रत?

पंचभीष्म व्रत को भीष्म पंचक व्रत या पंच भीखू व्रत भी कहा जाता है। भीष्म पंचक कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से आरंभ होता है और कार्तिक मास की पूर्णिमा तक चलता है। पूरे पांच दिन चलने वाले इस पंचक कार्य में स्नान और दान का बहुत ही शुभ महत्व होता है.

धार्मिक मान्यता अनुसार भीष्म पंचक के समय व्रत करने भी विधान बताया जाता है. भीष्म पंचक का यह व्रत अति मंगलकारी और पुण्यों की वृद्धि करने वाला होता है।

कब है पंचभीष्म-व्रत?
भीष्म पंचक आरंभ – 04 नवम्बर 2022, दिन शुक्रवार से
भीष्म पंचक समाप्त – 08 नवम्बर 2022, दिन मंगलवार पर

भीष्म पंचक – पंच भीखू कथा

प्राचीन समय में एक गाँव में एक साहूकार अपने बच्चों के साथ रहता था। साहुकार के एक बेटा-बहू थे। साहुकार की बहू धार्मिक प्रवृत्ति की थी। वह नियम-पूर्वक पूजा पाठ और सभी धार्मिक कार्य किया करती थी. जब कार्तिक मास आता था तो उस माह का पालन भी पूरे नियम करती थी। वह स्त्री कार्तिक मास में रोज सुबह उठ कर गंगा स्नान के लिए जाती थी।

उसी राज्य का राजकुमार भी गंगा स्नान के लिए ज़ाया करता था। एक बार राजा के बेटे ने देखा कि कोई व्यक्ति है जो उससे भी पहले उठ कर गंगा स्नान के लिए जाता है। उस के मन में ये बात जानने कि इच्छा हुई की वो कौन है जो उससे भी पहले गंगा स्नान करता है।

एक दिन साहूकार की बहू जब स्नान करके जा रही थी उसी समय राजकुमार गंगा स्नान के लिए आ रहा था। बहू आहट सुन कर जल्दी-जल्दी चलने लगती है। जल्द-बाजी में उसकी मोजड़ी यानि पायल गिर जाती है। राजकुमार को वह पायल दिखती है और वह उसे उठा लेता है।

वह मन ही मन सोचने लगता है की जिस स्त्री की यह माला मोजड़ी इतनी सुंदर है वह स्त्री खुद कितनी सुंदर होगी। वह गांव में यह बात फैला देता है की जिसकी भी पायल उसे प्रात:काल में मिली थी वह स्त्री उसके सामने आए ताकि वह उससे विवाह का प्रस्ताव रख सके।

साहूकार की बहू ने बहुत सोच-विचार किया। फिर उसने राजकुमार को कहलवा भेजा कि वह स्त्री वही थी और अगले पांच दिन वह गंगा स्नान के लिए आएगी। और यदि राजकुमार उसे देख पाया तो वह उसके साथ विवाह करेगी।

राजा के बेटे ने एक तोते को पिंजरे में बंद कर गंगा किनारे रख दिया ताकि जब वह स्त्री आए तो तोता उसे बता दे। साहुकार की बहू सुबह के समय गंगा स्नान के लिए आती है। वह भगवान से प्रार्थना करती है की वह उसके सतीत्व की लाज रखे। भगवान उसकी प्रार्थना स्वीकार करते हैं और राजा का बेटा सोता रह जाता है।

स्त्री जब नहा-धोकर जब चलने लगती है तो तोते से बोलती है कि तू मेरी लाज रखना। तोता उसकी प्रार्थना सुन कर कहता है, ठीक है मैं तेरी लाज रखूंगा। राजकुमार उठता है और वहां किसी को न पाकर तोते से पूछता है कि कोई स्त्री यहां आई थी। तोता इंकार कर देता है।

अगले दिन राजकुमार सोचता है कि वह आज किसी हाल में नहीं सोएगा। वह अपनी उंगुली काट लेता है ताकि दर्द में उसे नींद नहीं आए। वह स्त्री आती है और भगवान से उसी तरह प्रार्थना करती है और दैव-वश राजकुमार को फिर नींद आ आ जाती है। वह स्त्री स्नान कर के चली जाती है।

सुबह जब राजकुमार की नींद खुलती है तो वह तोते से फिर पूछता है। तोता इंकार कर देता है। अब राजकुमार सोचता है कि  आज वह अपनी आंखों में मिर्च डाल देगा जिससे उसे नींद नहीं आएगी। वह अपनी आंखों में मिर्ची डालकर बैठ जाता है। स्त्री फिर आती है और प्रार्थना करती है जिससे राजकुमार को फिर से नींद आ जाती है।

राजकुमार तोते से स्त्री के आने की बात पूछता है तो वह फिर से मना कर देता है। राजकुमार अब सोचता है कि आज वह बिना बिस्तर के ही बैठेगा जिससे नींद नहीं आएगी। वह बिना बिस्तर के बैठ जाता है और इंतजार करने लगता है। वह स्त्री आती है, गंगा स्नान करने से पूर्व भगवान से प्रार्थना करती है। राजकुमार को नींद आ जाती है। वह नहाकर चली जाती है।

राजकुमार अगले दिन गर्म अंगीठी के पास बैठ जाता है जिससे उसे नींद नहीं आती है। साहूकार की बहू आती है और भगवान से प्रार्थना करते हुए कह्ती है, “भगवान आप ही के कारण मेरा चार दिन कार्तिक स्नान हो पाया है। अब आज आखिरी दिन भी मेरे स्नान को पूर्ण करवा दीजिए”। भगवान की कृपा से राजकुमार को फिर से नींद आ जाती है।

साहुकार की बहु जब वह नहाकर जाने लगी तो तोते से कहती है कि इससे कहना मैंने आज पांच दिन पूरे कर लिए हैं और वह मेरी मोजडी़ यानि पायल मुझे भिजवा दे। राजकुमार उठता है तो तोता उसे सारी बात बता देता है। राजा के पुत्र को समझ आता कि वह स्त्री कितनी श्रद्धालु है और वह मन ही मन दुखी होता है।

कुछ समय बाद राजकुमार को कोढ़ हो जाता है। राजा को जब कोढ़ होने का कारण पता चलता है तब वह इसके निवारण का उपाय ब्राह्मणों से पूछता है। ब्राह्मण कहते हैं कि यदि राजकुमार साहूकार की पुत्रवधु को अपनी बहन बनाए और उसके नहाए हुए पानी से स्नान करे, तभी उसका कोढ़ ठीक हो सकता है। राजा की प्रार्थना को साहूकार की पुत्रवधु स्वीकार कर लेती है और राजा का पुत्र ठीक हो जाता है।

उस स्त्री और अन्य सभी पतिव्रता स्त्रियों के श्रद्धा-स्वरूप इस व्रत ने समय के साथ-२ परम्परा का रूप ले लिया जिसे लोग आज भी पूरे जोश और श्रद्धा से मनाते हैं। माना जाता है कि इस प्रकार जो भी व्यक्ति श्रद्धा और सात्विक भाव के साथ इन पांच दिनों तक स्नान और पूजा पाठ करता है उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

पंच-भीष्म व्रत की विधि

एकादशी, द्वादशी, त्रियोदशी, चौदस और कार्तिक पूर्णिमा को यह व्रत होता है। पंचभीष्म व्रत रखने से व्यक्ति निरोगी हो जाता है।

गौरतलब है कि पहले के समय में पंचभीष्म व्रत और तुलसी पूजा पांच दिनों तक होती थी। आंवले के पेड़ के नीचे खिचड़ी बना कर खाई जाती है। इन पांच दिनों तक घर आंवला, गन्ना, प्लाहा और फूल रखकर तुलसी माता की पूजा कर पंचभीष्म व्रत पांच दिन तक किया जाता है।

सुबह उठकर तारों की छाया में स्नान कर घी का दीप जलाया जाता है। इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इन दिनों में कार्तिक महात्मा के पाठ का भी लाभ मिलता है। जो पांच दिन तक व्रत रखना चाहते हैं वो एक समय फलाहार कर सकते हैं। अन्न खाना वर्जित है।

फलाहार मीठा या नमकीन कोई भी कर सकते हैं। सतोगुणी खाना खाएं और भगवान विष्णु के चरणों में ध्यान रखते हुए जाप करें। कार्तिक पूर्णिमा पर व्रत के अंतिम दिन ब्राह्मणों की पूजा करें और उन्हें यथाशक्ति दान दें। कार्तिक पूर्णिमा के दिन सुबह व शाम को दीप जलाएं। अगर हो सके तो दीप जल प्रवाह भी करें।

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