अपनी खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है कुल्लू का शांघड़ मैदान

कुल्लू : कुल्लू से 58 किलोमीटर की दूरी पर बसा है शांघड़ गाँव. नैसर्गिक सौन्दर्य से भरपूर यह मैदान सैंज घाटी के अंतिम छोर पर स्थित है. अपनी खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध शांघड़ मैदान को देखने के लिए देश व विदेश से पर्यटक आते हैं। लगभग 228 बीघा में फैले इस मैदान को कुल्लू जिला का खजियार या भारत का दूसरा मिनी स्विट्जरलैंड भी कहा जा सकता है।

देवता का चलता है यहाँ क़ानून 

प्राकृतिक सुंदरता में यह स्थान मिनी स्विट्जरलैंड के नाम से मशहूर चंबा जिला के खजियार से कम नहीं है। इस मैदान को देखने के लिए कई स्कूलों, कालेजों व अन्य संस्थानों के विद्यार्थी भी आते हैं लेकिन मैदान में किसी प्रकार की अपवित्रता न फैले, इसके लिए शंगचूल महादेव मंदिर कमेटी ने कायदे-कानून भी बना दिए हैं। अगर यहां आने वालों ने इनकी पालना नहीं की तो उन्हें जुर्माने या कानूनी कार्रवाई के लिए तैयार रहना पड़ेगा।

शंगचूल महादेव का है यहाँ आवास स्थल

यह मैदान यहां के स्थानीय देवता शंगचूल महादेव का आवास स्थल है। इस मैदान पर देवता के आदेशों की पालना नहीं हुई तो स्थानीय लोगों को इसके कोपभाजन का शिकार होना पड़ता है। यूं तो मंदिर तक पहुंचने के लिए सड़क निकाली गई है लेकिन मैदान तक वाहन लाने की मनाही है, साथ ही मैदान में गंदगी फैलाने, शराब पीकर आने तथा पुलिस और वन विभाग के कर्मचारियों के पेटी और टोपी पहनकर आने की सख्त मनाही है। देवता के कार-कारिंदों का कहना है कि देवता ने इस तरह का फैसला स्वयं ही लिया है, वे तो सिर्फ इसकी पालना करते रहे हैं। इसके लिए मंदिर कमेटी की ओर से बोर्ड भी टांग दिया गया है।

 

देवता के क़ानून का करना पड़ता है पालन

हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा में चेतावनी बोर्ड पर साफ लिखा गया है। विदेशी पर्यटकों को भी इसके बारे में सख्त निर्देश दिए गए हैं। शांघड़ मैदान का इतिहास पांडवों के जीवन काल से जुड़ा है। जनश्रुति के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने कुछ समय शांघड़ में भी बिताया। इस दौरान उन्होंने यहां धान की खेती के लिए मिट्टी छानकर खेत तैयार किए। वे खेत आज भी विशाल शांघड़ मैदान के रूप में यथावत हैं। इस मैदान की खासियत यह है कि मैदान में सिर्फ हरियाली ही हारियाली है। 228 बीघा में एक भी कंकड़-पत्थर नहीं है। शांघड़ पंचायत विश्व धरोहर ग्रेट हिमालयन नैशनल पार्क क्षेत्र में होने के कारण भी प्रसिद्ध है।

देवता को नहीं पसंद किसी की अकड़

जंगल की रखवाली करने वाले वन विभाग के कर्मचारियों व पुलिस महकमे के कर्मचारियों को अपनी टोपी व पेटी उतारकर मैदान से होकर जाना पड़ता है। यही नहीं, यहां पर घोड़े के प्रवेश पर भी मनाही है। यदि किसी का घोड़ा शंगचूल देवता के निजी क्षेत्र में प्रवेश करता है तो उसके मालिक को जुर्माना देना पड़ता है या फिर देवता कमेटी की ओर से उस पर कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाती है। शंगचूल महादेव के पुजारी ओम प्रकाश, कुलदीप शर्मा व रूपेंद्र राणा का कहना है कि देवता के पास कई ऐसे स्थान हैं, जहां केवल देवता के कुछेक कार-कारिंदे ही जाते हैं। यहां तक कि स्थानीय लोगों का प्रवेश भी यहां पर वर्जित है।

इस मैदान की वजह से मिली सैंज को पहचान

देश-विदेश के पर्यटकों के लिए शांत सैरगाह के रूप में शांघड़ को जाना जाता है। यहां की एकांत स्थली को कई शौधार्थियों ने अपने शोध के लिए चुना है। कुल्लू से 58 किलोमीटर की दूरी पर बसा शांघड़ गांव सैंज घाटी के अंतिम छोर पर है। एक हजार से अधिक आबादी वाले शांघड़ को भी अपने मैदान से पहचान मिली है।

पर्यटन के हुए नए आयाम स्थापित

यही नहीं, सैंज घाटी के लिए शांघड़ से पर्यटन के नए आयाम स्थापित हुए हैं। गर्मियों के दिनों में यहां अधिक संख्या में पर्यटक आते हैं जिससे यहां का पर्यटन कारोबार भी चरम पर पहुंच जाता है। देवता की पूरी जमीन का आधा हिस्सा ऐसा है जो ब्राह्मण, पुजारी, मुजारों, बजंतरी व गुर सहित अन्य देव कारकूनों को दिया गया है। वहीं आधा हिस्सा गौ चारे के रूप में खाली रखा गया है।
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