अब नहीं दिखती खेतों में बैलों की जोड़ियाँ

परिवर्तन समय का नियम है. आज समय के साथ -साथ लोगों के रीति -रिवाज़, खान -पान तथा रहन -सहन का अंदाज़ बिल्कुल ही बदल गया है. वो भी समय था जब बैलों की जोड़ियाँ खेतों की शोभा बढ़ाती थीं. बैल न पालने के पीछे भी कई कारण हैं जिससे अब किसान जोखिम नहीं लेना चाहता.

हर बैल के रखे होते थे नाम

हर बैल के नाम रखे होते थे तथा किसान हल चलाते वक्त ज़ोर -जोर से मैहंदु, बादामी, वोलु, काली नाम की आवाजें निकालते थे तथा पता चल जाता था कि किसान खेतों को जोत रहे हैं. संयुक्त परिवारों के टूटने के कारण अब खेतों में बैल नहीं दिखते.

संयुक्त परिवारों में होती थी बैलों की जोड़ियाँ

पुराने समय में सयुंक्त परिवारों में कई सदस्य होते थे. खेतों में सभी मिलजुल कर काम करते थे तथा कार्य आसान भी हो जाया करता था. आज संयुक्त परिवार टूटने के कारण परिवार में सदस्य कम रह गये हैं अब पहले जितने मेहनत किसान के परिवार करना भी नहीं चाहते.

कई किसानों की जमीन पड़ी है खाली

आज कई किसानों ने अपनी जमीन खाली छोड़ दी है. अब किसान इसमें फसल नहीं उगाते. इसके पीछे भी कई कारण हैं. कई परिवारों में लोग जमीन होते हुए भी कार्य नहीं करना चाहते तो कई परिवारों के लोग आर्थिक रूप से मजबूत हैं इसलिए खेती नहीं करना चाहते.

जंगली सूअर और बंदर भी हैं जिम्मेवार

खेती न करने का एक बड़ा कारण जंगली सूअर तथा बंदर भी हैं. दिन रात मेहनत करने के बाद भी फसल उतनी नहीं हो पाती. इस प्रकार आज बैलों का महत्व कम हो रहा है. एक तो बैलों को चारे की जरूरत होती है जोकि पूरी नहीं हो पाती दूसरा कई किसानों ने एक एक बैल पाल रखे हैं.

आज है मशीनी ट्रैक्टर का जमाना

आज लगभग हर किसान के पास ट्रैक्टर है और जिसके पास नहीं है वो पैसे देकर खेती कर रहे हैं. कुल मिला कर बैलों का महत्व कम होना लाज़मी ही है तथा किसान अब कोई भी जोखिम उठाना भी नहीं चाहता.

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