सबका मंगल करती है माँ मंगरौली

जोगिन्दरनगर : माँ मंगरौली का भव्य मंदिर सिकंदर धार में एहजू -बसाही सड़क के साथ लगती सुन्दर पहाड़ी में स्थित है. माँ मंगरौली के पश्चिम में माँ गढ़ वाली माहेश्वरी माँ का मंदिर स्थित है. माँ मंगरौली मंदिर से चारों ओर का खूबसूरत नजारा आनंद का अहसास करवाता है.

ब्यास नदी का होता है दीदार

मंगरौली माँ के मंदिर से ब्यास नदी का खूबसूरत नजारा दिखाई देता है. यहाँ से विश्व प्रसिद्ध बीलिंग घाटी के दीदार भी होते हैं. बर्फ से लकदक धौलाधार का सुन्दर दृश्य भी यहाँ से दिखाई देता है.

सिकंदर का तोड़ा था अहंकार

किवदंती के अनुसार राजा सिकंदर ने विश्व विजेता बनने का स्वप्न देखा था. इसी क्रम में माँ ने सिकंदर को चेतावनी दी कि वह अपना अहंकार छोड़ने  तथा माफ़ी मांग कर पश्चाताप करने के लिए कहा तो सिकंदर ने माँ मंगरौली के पास घुटने टेके थे.

विधि विधान से करवाया था हवन

मंगरौली माँ ने राजा को चेताया था कि उसका पश्चाताप मंदिर में ब्राहमणों द्वारा हवन तथा दान दक्षिणा करने से समाप्त होगा. इस प्रकार राजा ने पंडित बुलाए और माँ की गुफा में पंडित द्वारा हवन का आयोजन किया गया.

पंडित को दान दी भूमि

राजा सिकंदर ने हवन करवाने के बदले में पंडित को यहाँ मंदिर के पास भूमि दान में दी थी. पंडितों ने यहाँ माँ की कई वर्षों तक सेवा की. उन्होंनें यहाँ पर एक गौशाला भी बनाई थी. पंडित भड़ोल से यहाँ अपने पशु चराने आते थे.पंडित गाय को यहाँ काफी समय तक चराने के लिए छोड़ जाते थे.

बांका नामक ग्वाला चराता था यहाँ गाय

यहाँ मंदिर के पास बांका नाम का एक ग्वाला गाय चराता था. जो गाय दूध देने वाली होती थे उसे पंडित अपने घर भड़ोल ले जाते थे और जो गाय दूध देना बंद कर देती थी उसे यहाँ छोड़ जाते थे.यह सिलसिला कई वर्षों तक चलता रहा.

मंगला और रौली नामक गाय थी बाँझ

मंगला और रौली नामक दो गायें ऐसी थी जो बाँझ थीं.जब कई वर्षों तक बांका ग्वाला गायें चराता चराता तंग हो गया तो उसने माँ से प्रार्थना की कि अगर मंगला और रौली दोनों गायें अगर सू जाएँ तो उसे भी छुटकारा मिले और अपने घर चला जाए.

जब दोनों गायें सू गई

माँ की कृपा से मंगला और रौली नामक दोनों गायें सू गईं और जब दूध देने लगीं तो बांका ग्वाला की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. उसके बाद बांका ग्वाला दोनों गायों को भड़ोल लेकर गया. मंगला और रौली नामक गायों के कारण ही इस स्थान का नाम मंगरौली पड़ा है. मंगरौली माँ आज दूध दायत्री के नाम से भी जानी जाती है.

मार्गशीर्ष के प्रथम प्रविष्टे को होता है मेला

सिकंदर ने जब यहाँ हवन का आयोजन करवाया था तो उस दिन मार्गशीर्ष महीने का प्रथम प्रविष्टा और सक्रांति भी थी. तब से लेकर आज तक सक्रांति को यहाँ मेला लगता है. नवरात्रों में यहाँ काफी भक्त अपनी मनोकामना लेकर आते हैं.

उत्थान की ओर अग्रसर है मंदिर

दो वर्ष पूर्व स्थानीय क्षेत्रवासियों के सहयोग से मंदिर कमेटी का गठन किया गया है. कमेटी के सहयोग से मंदिर के विकास के लिए प्रयास ज़ारी हैं.मंदिर भवन निर्माण में 8 लाख रूपये की राशि खर्च की जा रही है.एक सराय भवन,पुजारी के रहने हेतु एक कमरा,एक रसोईघर सडक के पास एक बड़े द्वार का निर्माण,द्वार के पास ही दुर्गा माँ का वाहन शेर का निर्माण भी किया गया है.निर्माण कार्य ज़ारी है.

जय माँ मंगरौली

 

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