चंद दिनों के बाद रंगों का त्योहार होली आने वाला है, होली के लिए बाजार सजना शुरु हो गए हैं, यकीनन आप भी इस बार होली कैसे मनानी है कहां मनानी हैं इस पर सोच विचार कर रहे होंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि होली के रंगों से पहले एक ऐसा काल आता है, जिसे हल्के में नहीं लिया जाता, जिसे अशुभ समय माना जाता है।
क्या है होलाष्टक ?
ये एक या दो दिन नहीं बल्कि पूरे 8 दिन की अवधि होती है, जिसे हम होलाष्टक कहते हैं। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक के ये आठ दिन परंपराओं में बेहद संवेदनशील माने गए हैं। जैसे ही होलाष्टक आरंभ होता है, हर काम थोड़ी ज्यादा सावधानी से किया जाता है। मांगलिक कार्यों की तैयारियां रुक जाती हैं, शुभ मुहूर्त टाल दिए जाते हैं, और बड़े-बुजुर्ग एक ही बात कहते हैं—“अभी ठहर जाओ… समय अच्छा नहीं है।
3 मार्च को होगा होलाष्टक का समापन
इस साल होलाष्टक 24 फरवरी, यानि कि मंगलवार से शुरु हो रहे हैं, और फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होलिका दहन वाले दिन यानि कि 3 मार्च को इसका समापन होगा। हालांकि अब आपके जहन में सवाल आ रहा होगा कि आखिर क्यो होलाष्टक को इतना अशुभ माना गया है, तो इसके पीछे की वजह भी काफी अहम है।
बढ़ता है नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव
पहली मान्यता तो ये कहती है कि इस समय के दौरान संसार में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है, जिससे किसी भी नए कार्य के सफल होने की संभावना कम हो जाती है। दरअसल ये वह समय हैं जब होलिका ने प्रह्लाद को मारने की कोशिश की और स्वयं दहन में जल गई थी, धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी कालखंड में भक्त प्रह्लाद की कठिन परीक्षाएं शुरू हुई थीं।
उनके पिता हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति से रोकने के लिए उन्हें अनेक यातनाएं दीं, लेकिन प्रह्लाद की आस्था अडिग रही। अंततः पूर्णिमा के दिन होलिका दहन हुआ और बुराई का अंत हुआ। इसी कारण इन आठ दिनों को अशांत और उग्र समय माना जाता है।
आठ प्रमुख ग्रह रहते हैं उग्र अवस्था में
इसके अलावा ज्योतिषीय दृष्टि से होलाष्टक के आठ दिनों में सौरमंडल के आठ प्रमुख ग्रह उग्र अवस्था में रहते हैं। विशेषकर सूर्य, चंद्र और शनि की दृष्टियां, इस अवधि को नए कार्यों और शुभ संस्कारों के लिए अनुकूल नहीं बनाती हैं।
ग्रहों की इस उग्रता के कारण व्यक्ति की निर्णय लेने की क्षमता और मानसिक शांति प्रभावित हो सकती है। वहीं प्रकृति के मौसम परिवर्तन और उग्रता के कारण भी यह समय मानसिक और शारीरिक अशांति का माना जाता है।
इस अवधि में नहीं होते मांगलिक कार्य
इसी वजह से इन दिनों में शुभ कार्यों पर ब्रेक और पूजा पाठ पर ज्यादा समय दिया जाता है। मान्यता के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि जब ग्रह स्थिर न हों अगर उस वक्त कुछ भी शुभ कार्य किया जाए तो उसमें अड़चन आ सकती है या फल नकारात्मक मिल सकता है। इसी वजह से इन 8 दिनों में विवाह और सगाई जैसे मांगलिक कार्य, गृह प्रवेश, नया व्यवसाय शुरू करना, बड़ा निवेश या महत्वपूर्ण निर्णय इन सबको टाल दिया जाता है।
हालांकि इन 8 दिनों में अगर आप कुछ सावधानियां बरतते हैं, तो इसके नकारात्मक प्रभाव से बच सकते हैं. इस समय में तामसिक भोजन और नशीले पदार्थ का त्याग करना चाहिए ताकि ग्रहों की उग्रता आपके व्यवहार पर हावी न हो, पूजा पाठ पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
क्या करें क्या न करें
इन 8 दिनों में क्रोध और विवाद से बचें। आत्मचिंतन करें, नकारात्मक नजरिए को छोड़ सकारात्मक विचारों पर ध्यान दें। घर पर गंगाजल का छिड़काव करें, कपूर जलाएं और दान करें। ताकि होलाष्टक के नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सके।
होलाष्टक के दौरान भगवान विष्णु, नारायण और श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करना शुभ माना गया है। भगवान विष्णु की आराधना से नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं। वहीं अगर आप नौकरी में बदलाव कर रहे हैं तो होलाष्टक के बाद ज्यादा सही रहेगा। साथ ही इस समय ना तो प्रॉपर्टी खरीदें और ना ही बेचें । ताकि होलाष्टक का नकारात्मक प्रभाव आप पर न पड़े.































