इस पवित्र स्थान में स्थित है भगवान शनिदेव के गुरु का मंदिर

जोगिन्दरनगर : हिमाचल प्रदेश में काँगड़ा जिला के बैजनाथ से कुछ ही दूरी पर स्थित है महाकाल मंदिर. यह देश का शायद ऐसा पहला मंदिर है जहाँ भगवान महाकाल के साथ भगवान शनिदेव भी विराजते हैं. महाकाल मंदिर में भगवान शनिदेव भाद्रपद मास में अपनी माता छाया के साथ स्थापित हुए थे वहीँ शनिदेव महाकाल के शिष्य भी हैं. बड़ी बात यह है कि इस मंदिर में शनिदेव क्रूर नहीं बल्कि सौम्य रूप में विराजमान हैं. कहा जाता है इस मंदिर में स्वामी विवेकानंद भी कुछ समय तक रुके थे. इस स्थान में भाद्रपद माह में भगवान शनिदेव के मेले लगते हैं. इसमें लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है.

माँ छाया के साथ हुए थे स्थापित

महाकाल मंदिर में भगवान शनिदेव भाद्रपद मास में अपनी माता छाया के साथ स्थापित हुए थे वहीँ शनिदेव महाकाल के शिष्य भी हैं. कहा जाता है की शनिदेव ने महाकाल को अपना गुरु बनाया था तभी से गुरु शिष्य के रिश्ते को मानते हुए लोग भगवान शिव के महाकाल रूप के साथ शनिदेव की पूजा कर रहे थे.

12 राशियों के स्तम्भ हैं यहाँ

महाकाल मंदिर के प्रांगण में 2005 में यहाँ अलग मंदिर बनाकर शनिदेव शिला की स्थापना की गई थी. इस मंदिर में 12 राशियों के ग्रह  शांति  के लिए अलग अलग 12 स्तम्भ बनाये गये हैं. यहाँ डोरी बंधने का अपना विशेष महत्त्व है भगवान शनिदेव हर प्राणी में 12 राशियों के ऊपर चलते हैं मनुष्य के जीवनकाल में शनिदेव सभी राशियों में आ आते हैं

वैदिक शैली में निर्मित है मंदिर

यहाँ वैदिक शैली में निर्मित भगवान शनिदेव का मंदिर बनाया गया है इसमें 12 राशियों के खम्भे है अपनी अपनी राशि के खम्भे में धागे बंधने से शनि की शांति होती है और जीवन में रोग अल्प मौत तथा कोर्ट कचहरी  के केसों से मुक्ति मिलती है.

उज्जैन के बाद यहाँ है महाकाल मंदिर

देश भर महाकाल का एक मंदिर उज्जैन में है और दूसरा हिमाचल के बैजनाथ के पास स्थित है. कहा जाता है इस मंदिर में स्वामी विवेकानंद भी कुछ समय तक रुके थे यहाँ कुछ साल पहले माँ दुर्गा के मंदिर की स्थापना की गई थी. इस स्थापना के दौरना भी के घटनायें घटी थीं.

भाद्रपद में लगते हैं मेले

इस स्थान में भाद्रपद माह में भगवान शनिदेव के मेले लगते हैं. इसमें लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है. कहा जाता है की यहाँ भगवान भोलेनाथ ने महाकाल का रूप धारण करके जालंधर दैत्य का संहार किया था. इसी स्थान पर जालंधर ने अपनी अंतिम इच्छा में महादेव से कहा था की उसके वध के बाद इस स्थान में लोगों को अकाल मृत्यु से मुक्ति व मोक्ष प्राप्ति हो सके. यह मंदिर कभी अघोरी साधुओं की तपोस्थली भी रहा है. यहाँ आज से पांच दशक पहले तक लोगों को केवल शिवरात्रि पर्व पर आने की ही अनुमति थी.
                                                     “जय महाकाल” “जय शनिदेव”
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