हिमालय की ‘जैविक घड़ी’ में भारी फेरबदल, वनस्पति विज्ञान विभाग ने बताया चिंताजनक

हिमाचल प्रदेश की ऊंची चोटियों से लेकर निचली घाटियों तक इस बार प्रकृति का मिजाज कुछ बदला-बदला सा है। पहाड़ों के वे जंगल, जिन्हें मार्च के अंत तक ‘बुरांश’ की लालिमा का इंतज़ार होता था, वे अब फरवरी में ही सुर्ख लाल हो चुके हैं।

समय से पहले ही बाज़ार में पहुंचा लिंगड़ी बुरांस

यही नहीं, नमी वाले इलाकों में उगने वाली बेशकीमती जंगली सब्जी ‘लिंगड़ी’ भी अपने तय वक्त से दो महीने पहले ही बाज़ार में दस्तक दे रही है।

यह बदलाव केवल मौसम की एक घटना नहीं है, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में आ रहे एक बड़े ‘सांस्कृतिक और वैज्ञानिक संकट’ का संकेत है। मंडियों में विक्रेता हैरान, वैज्ञानिक परेशान मंडी के ऐतिहासिक चौहट्टा बाज़ार में इन दिनों अजीब सा नज़ारा है।

स्थानीय विक्रेता जीवानंद बताते हैं कि पहले हम मार्च के मध्य व आखिरी तक बुरांश के फूलों का इंतज़ार करते थे, लेकिन अब लोग जनवरी के आखिर में ही फूल और फरवरी में लिंगड़ी लेकर आने लगे हैं।

वैज्ञानिक भाषा में इसे ‘फेनोलॉजिकल शिफ्ट’ कहा जाता है—यानी पौधों के फलने-फूलने के चक्र में बदलाव।

जब सर्दियां अपनी सामान्य तीव्रता खो देती हैं और तापमान अचानक बढने लगता है, तो पौधों को ‘भ्रम’ होता है कि बसंत आ गया है।

वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष मंडी कालेज एवं जंगली खाद्य पौधों की विशेषज्ञ डा. तारा देवी सेन के अनुसार, इस बदलाव के मुख्य कारक तापमान में वृद्धि-जिसमें पिछले कुछ दशकों में सर्दियों का औसत तापमान 1.3 डिग्री सैल्सियस तक बढ़ा है।

चिलिंग आवर्स की कमी-सेब और बुरांश जैसे पौधों को फलने के लिए एक निश्चित समय तक ठंड चाहिए होती है। कम बर्फबारी के कारण यह चक्र टूट रहा है। अनियमित वर्षा चक्र-पश्चिमी विक्षोभ के कमज़ोर पडऩे से मिट्टी की नमी खत्म हो रही है।

खो देंगे हम अपनी पारंपरिक पहचान

ये जंगली पौधे केवल भोजन नहीं, बल्कि हिमाचल की सेहत और अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। परागण का संकट-यदि बुरांश समय से पहले खिलता है और उसे परागित करने वाले कीट (मधुमक्खी आदि) उस समय सक्रिय नहीं होते, तो आने वाले समय में इन पेड़ों के बीजों का बनना बंद हो जाएगा।

औषधीय गुणों में गिरावट-समय से पहले पकने वाली ‘लिंगड़ी’ और ‘सेमल’ के पोषक तत्वों और स्वाद में बदलाव आने की आशंका है।

पारंपरिक ज्ञान का अंत-पीढिय़ों से चला आ रहा वह ज्ञान, जो बताता था कि कब कौन सी जड़ी-बूटी चुननी है, अब इस अनिश्चितता के कारण बेअसर साबित हो रहा है।

वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष डा. तारा सेन का कहना है कि अब जागने का समय है हिमालय के बदलते पर्यावरण की यह कहानी केवल पेड़ों-पौधों तक सीमित नहीं है।

यह हमारे अस्तित्व से जुड़ी है। हमें ज़रूरत है कि हम-बदलते मौसम के साथ पौधों के व्यवहार का वैज्ञानिक दस्तावेज़ीकरण करें। जंगलों से इन उत्पादों के सतत दोहन को लेकर कड़े नियम बनाएं। स्थानीय समुदायों को जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूक करें।