लोक संस्कृति, रीति रिवाजविशेष लेख

“स्थानीय कलाकारों की उपेक्षा लोक संस्कृति के लिए घातक”

कार्टूनिस्ट अरविन्द (https://fb.com/kaktoons)

देवभूमि हिमाचल प्रदेश की अपनी एक बहुत ही सम्पन संस्कृति रही है. यहाँ के मेले त्यौहार यहाँ के उत्सव यहाँ की लोकसंस्कृति को सभी के समक्ष प्रस्तुत करने का सशक्त माध्यम रहे हैं और मेले एवं त्योहारों को उस्तव के रूप में मनाए जाने के पीछे भी यही मुख्य कारण रहा है कि हम अपनी परम्पराओं अपनी संस्कृति अपनी लोकभाषाओं को अपनी आगे आने वाली पीढ़ियों को विरासत के रूप में दे सकें.

featured-1-by-cartoonish-arvind

मेले एवं त्यौहार हमारी संस्कृति को पीढ़ी दर पीढ़ी अपने पारम्परिक सरकोरों से जोड़ने के लिए एक कड़ी का काम करते आए हैं। लेकिन आज मेले एवं त्योहारों का आयोजन मात्र एक औपचारिकता बन के रह गए हैं. हम अपनी सम्पन संस्कृति, भाषाओँ, लोक गीतों से मुहं मोड़ चुके हैं. दुखद है जो कलाकार आज की तारीख में अपनी संस्कृति अपने लोकगीतों आदि के क्षेत्र में काम कर रहे हैं उनको नज़रअंदाज़ करके बाहर के कलाकारों को ऊंचे दामो पर दलालों को कमीशन खिलाकर हमारे सामने पेश किया जा रहा है और हमारे कलाकार मुफलिसी के दौर से गुजर रहे हैं. बहुत ही दुखद है कि कलाकरों की नीलामी की जा रही है जिसमें हिमाचली कलाकार घर की मुर्गी दाल बराबर बना के रख दिए गए हैं. चाहे ग्रीष्मोत्स्व होँ विंटर कार्निवाल होँ या मेले एवं त्यौहार हों दलालों को पालने के लिए आयोजित हो रहे हैं.

स्थानीय कलाकारों को अगर परफॉर्म करना हो तो लिंक होना जरूरी है और लिंक होने के बाद उनसे खाली कुर्सियों के सामने ही परफॉर्म करवा दिया जाता है क्यूंकि स्टार नाईट तो बाहर के कलाकारों के नाम की होती है हमारे कलाकार कैसे स्टार बनेंगे इसका जवाब शायद आज का सिस्टम देना भी नहीं चाहता.

नाम देखो
दाम देखो
संस्कृति के सरंक्षण को
सियासत की मंडी में
रहनुमाओं का पैगाम देखो
मिंजर के मंज़र में
कलाकारों को होते नीलाम देखो

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *