मंडी जिला का ‘बांठड़ा’ विलुप्ति के कगार पर

मंडी : एक वो भी दौर था जब न तो रेड़ियो का कोई साधन होता था और न ही टेलीविजन का. लेकिन लोगों के पास मनोरंजन के ऐसे साधन मौजूद थे जिनके माध्यम से न सिर्फ मनोरंजन होता था बल्कि व्यंगात्मक तरीके से अपने इलाके की समस्याओं का भी समाधान होता था. एक ऐसा ही माध्यम होता था बांठड़ा. बांठड़े की यह परंपरा सिर्फ मंडी जिला में ही थी. राजाओं के दौर में गांव के लोग तरह-तरह के स्वांग (भेष) रचकर राजा और प्रजा का मनोरंजन करते थे.

लोगों को हंसाने के लिए यह स्वांग रचा जाता था और मजेदार व चुटीली बातें करके लोगों का मनोरंजन किया जाता था. शाम ढलने पर यह सिलसिला शुरू होता था और देर रात तक जारी रहता था. हालांकि यह सबकुछ आज भी देखने को मिलता है. लोग आज भी तरह-तरह के स्वांग रचकर लोगों का मनोरंजन करते हैं लेकिन तब और अब में अंतर यह आ गया है कि तब इसे समय-समय पर किया जाता था और अब वर्ष में एक बार सिर्फ औपचारिकता के तौर पर.

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राजाओं के दौर में इसे मनोरंजन के साथ समस्याओं को उजागर करने का भी एक सशक्त माध्यम माना जाता था. बांठड़े के कलाकार व्यंगात्मक तरीके से अपने गांव की समस्याओं को राजा के समक्ष रखते थे और उनका समाधान भी होता था, लेकिन आज ऐसा कुछ भी नहीं होता. कभी कभार जिला मुख्यालय पर अधिकारियों के सामने होने वाले बांठड़े में इस व्यंग्य का इस्तेमाल हो जाता है, लेकिन ग्रामीण स्तर पर होने वाले बांठड़े इससे कोसों दूर चले गए हैं. बदलते समय के साथ अब लोगों के उत्साह में भी बांठड़े के प्रति बेरूखी साफ तौर पर देखने को मिल रही है. अधिकतर लोग घरों पर टीवी देखकर ही मनोरंजन कर लेते हैं जबकि बांठड़े में होने वाले मनोरंजन की तरफ कोई ध्यान नहीं देता. गिने चुने लोग ही बांठड़े में आकर हंसी के ठहाके लगाते हुए नजर आते हैं। कहीं पर बांठड़ा देव परंपराओं के साथ जुड़ा हुआ है और इसके अब तक बचे रहने का कारण भी शायद यही है. जबकि युवा पीढ़ी बांठड़े से पूरी तरह से विमुख हो चुकी है.

बांठड़े की विलुप्त होती जा रही इस प्राचीन कला को जिला के कुछ कलाकारों ने आज भी जीवित रखा हुआ है और इसी के चलते आज यह कला थोड़ी बहुत बच पाई है, जबकि अधिकतर स्थानों पर अब इसका जिक्र तक नहीं किया जाता. ज्यादातर भावी युवा पीढ़ी को इस बात की जानकारी भी नहीं कि आखिर बांठड़ा होता क्या है, क्योंकि उनके लिए अब एंड्रायड फोन ही उनके मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन है.

स्रोत : पंजाब केसरी

लोक संस्कृति, रीति रिवाज

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