आधुनिकता की दौड़ में दम तोड़ रहा हस्तशिल्प का कारोबार

जोगिन्दरनगर : इसे समय का प्रभाव कहें या मशीनी युग लेकिन यह बात सत्य है कि आधुनिकता की दौड़ में कई ऐसी कलाएं हैं जो पीछे छूटती जा रही हैं. हस्तशिल्प का कारोबार मशीनी युग की भागमभाग में घटता जा रहा है. हस्तशिल्प उद्योग पर प्लास्टिक से बनी वस्तुएं भारी पड़ने लगी हैं. हालाँकि प्लास्टिक की वस्तुएं टिकाऊ व किफायती लगती हैं लेकिन इनसे पर्यावरण को बचाने की जगह उसे प्रदूषित करने की क्षमता ज्यादा होती है. हालांकि केन्द्रीय सरकार हथकरघा और हस्तशिल्प मंत्रालय इस ओर गंभीर हैं. प्रदेश सरकार को भी इस प्रकार की कला के प्रति गम्भीर होने की जरूरत है.

हस्तशिल्प को नहीं मिलता रिस्पांस

अब हस्तशिल्प को ज्यादा रिस्पांस नहीं मिलता है. आज हस्तशिल्प से बनी वस्तुओं का प्रदर्शन ड्राइंग रूम की दीवारों पर मात्र लटकने वाले एक शोपीस तक सीमित हो गया है. इससे इस कुटीर उद्योग में जुड़े हजारों कारोबारी हाड पर हाथ धरे बैठे रह गये हैं.

कारोबार से नहीं जुड़ रहे युवा

दशहरा उत्सव कुल्लू गए मंडी के कारोबारी मेहर सिंह व ब्रिज लाल का कहना है कि अब युवा वर्ग भी इस कारोबार से मुंह मोड़ रहा है. उनका कहना है कि प्रदेश की पारम्परिक वस्तुएं जिनका पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए अहम भूमिका रहती है अब उसे प्लास्टिक उद्योग ने एकदम खत्म कर दिया है. इससे हस्तशिल्पकारी भी हताश हो गए हैं.

बांस की वस्तुओं से जी चुराने लगे हैं लोग

प्रदेश के सभी मेले जो कई सदियों से प्रदेश की संस्कृति का प्रतीक रहे हैं व यहाँ प्रयोग होने वाले औज़ार और बांस की लकड़ी से बनने वाले किल्टे,टोकरी व कई प्रकार की वस्तुओं से लोग अब जी चुराने लगे हैं.हालांकि प्रदेश में हस्तशिल्प जो मेले का अहम पहलु होता था उससे विमुख होने वाला इंसान आज इसकी महता को भूलकर पर्यावरण को प्रदूषित करने वाली वस्तुओं की ओर बढ़ रहा है.

प्लास्टिक की वस्तुएं पड़ी भारी

हस्तशिल्प उद्योग पर प्लास्टिक से बनी वस्तुएं भारी पड़ने लगी हैं. हालाँकि प्लास्टिक की वस्तुएं टिकाऊ व किफायती लगती हैं लेकिन इनसे पर्यावरण को बचाने की जगह उसे प्रदूषित करने की क्षमता ज्यादा होती है. पहले जब बांस के बने किल्टे और टोकरी जोकि टूट कर भी खेतों में खाद के लिए उपयोग में लाए जाते हैं. लेकिन बांस से बनी वस्तुओं की नजरअंदाजी इस उद्योग की समाप्ति की ओर ले जा रही है.

राज्य सरकार करे प्रयास

हालांकि केन्द्रीय सरकार हथकरघा और हस्तशिल्प मंत्रालय इस ओर गंभीर है लेकिन इस ओर ध्यान न देना राज्य सरकार की नाकामी है. इसके लिए लोगों में जागरूकता की कमी है. सरकार की योजनायें लोगों तक नहीं पहुँचती या लोगों को स्कीमों का ज्ञान नहीं है.इसके प्रति जागरूक होकर कृषि व बागवानी कार्य में रोज प्रयोग होने वाली इन वस्तुओं के बाज़ार में ग्राहक नहीं हैं, लेकिन आधुनिकता के इस दौर में हस्तशिल्प कारोबार आज शोपीस बनकर रह गया है.

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