क्या हिन्दी भाषा अपने घर में दासी बन गई है?

हिन्दी भाषा बोलने के अनुसार अंग्रेज़ी और चीनी भाषा के बाद पूरे दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी भाषा है, लेकिन उसे अच्छी तरह से समझने, पढ़ने और लिखने वालों में यह संख्या बहुत ही कम है. यह संख्या और भी कम होती जा रही है.

इसके साथ ही हिन्दी भाषा पर अंग्रेजी के शब्दों का भी बहुत अधिक प्रभाव हुआ है और कई शब्द प्रचलन से हट गए और अंग्रेज़ी के शब्द ने उसकी जगह ले ली है, जिससे भविष्य में हिन्दी भाषा के विलुप्त होने की भी संभावना अधिक बढ़ गई है.

इस कारण ऐसे लोग जो हिन्दी का ज्ञान रखते हैं या हिन्दी भाषा जानते हैं, उन्हें हिन्दी के प्रति अपने कर्तव्य का बोध करवाने के लिए इस दिन को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है. जिससे वे सभी अपने कर्तव्य का पालन कर हिन्दी भाषा को भविष्य में विलुप्त होने से बचा सकें. लेकिन लोग और सरकार दोनों ही इसके लिए उदासीन दिखते हैं.

हिन्दी तो अपने घर में ही दासी के रूप में रहती है. हिन्दी को आज तक संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा नहीं बनाया जा सका है. इसे विडम्बना ही कहेंगे कि योग को 177 देशों का समर्थन मिला, लेकिन हिन्दी के लिए 129 देशों का समर्थन क्या नहीं जुटाया जा सकता?

आज ऐसे हालात आ गए हैं कि हिन्दी दिवस के दिन भी कई लोगों को ट्वीटर पर “हिन्दी में बोलो” जैसे शब्दों का उपयोग करना पड़ रहा है.

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