गोई जो मिल्ली गोह तेड़ी ओ तेड़ी ओ

हऊँ मेरी घरावालीया कने नौकरिया गे घरा जो छुट्टिया मंझ घरा जो था आईरा. 16-17 साला री मेरी भांजी बचपना गे अस्सा कने असारे घरा मंझ रहन्दी. इक दिन मेरी घरावाली कने मेरी भांजी घराला पीछे लक्डूआं जो थी गेईरी. कने ओथी बैठी कने गप्पा मारना लगिरी थी. जाली भी ए दोनों मिली जांदी खूब गप्पा मारदी. हऊँ कने मेरे पापा बोहड़ी ओटे (बरामदे) पर बैठी कने अपणा-अपणा कम लगिरे थे करना पर मेरा ध्यान ता ओथी ही था. बड़ी देर होई गेई ता मिंजो ते रही नी होया. मैं पापे(जी) कने बोलेया, “देखा भला इन्हा जो. अधा घंटा होई गेया. हाली इन्हा रे लक्डू नी आये.”

पापा अखबार पढ्दे-पढ्दे हास्से कने बोले – “गोहई जो मिल्ली गोह तेहड़ी ओ तेहड़ी ओ”

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