कुरल (नर) और कुरलाणी (मादा) की कहानी

कुरल (नर) और कुरलाणी (मादा) दो पक्षी होते हैं। किवदंती के अनुसार ये दोनों पक्षी ब्यास नदी तट के किनारे 16 (श्रावण माह से अन्तिम 8 दिन व भाद्रपद माह से प्रथम 8 दिन) घनघोर तपस्या करते हैं। श्रावण महीने के अंतिम छोर में 8 दिन कुरल एक टांग पर खड़े होकर घनघोर तपस्या करता है इस दौरान कुरलाणी उसके लिए भोजन की व्यवस्था करती है।

कुरल और कुरलाणी

उसके बाद आठ दिन कुरलाणी उसी क्रम से तपस्या करती है और कुरल भोजन लाता है। नियमानुसार लाया गया भोजन पहले ही झपटे में जो भी मिल जाए वही खाना होता है अन्यथा यह भूखे ही रह कर तपस्या करते हैं।

इन सोलह दिनों में 8 दिन भयंकर बरसात होती है और अगले 8 दिन शांति बनी रहती है। जनश्रुति के अनुसार  हमारे पूर्वजों ने जो कहा है कि 16 दिन की तपस्या के समाप्त होने के साथ ही बरसात भी समाप्त हो जाती है।

कुरल या कुरलाणी में एक कोई जब तपस्या कर रहा होता है तो भयंकर बरसात करता है। देवता जब बरसात के मौसम में योग निद्रा में चले जाते हैं और धरती में बुरी शक्तियों का साया न बढ़ जाये इसलिए भगवान भोलेनाथ श्रावण के महीने में धरती पर वास करते हैं।

करलाणी की तपस्या खत्म होते ही देवताओं के जागने का समय आ जाता है इसी कारण से इस धरती में जब देवता योग निद्रा में हो तो कई प्रकार के जीव जन्तुओ का जन्म होता है जो देवताओं के जागने पर धीरे धीरे समाप्त होने लगते हैं।

इसके बाद भादों मास की अमावस्या को देवताओं व डायनों  का युद्ध होता है जिस में कोई एक जीतता है । यह युद्ध 4 दिन चलता है। संकट चतुर्थी (पत्थर चौथ) के दिन हार जीत का निर्णय होता है, देव डायनों के युद्ध के बाद ऋतु परिवर्तन शुरू जाता है और धीरे धीरे शरद ऋतु दस्तक देने लगती है।

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