जोगिन्दरनगर : आप सभी को भाई बहन के प्रेम के पर्व रक्षा बंधन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं. इस बार रक्षा बंधन का पर्व शुक्रवार को बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है.
शुभ मुहूर्त और समय
- पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 27 अगस्त 2026 को सुबह 09:08 बजे [1]
- पूर्णिमा तिथि समाप्त: 28 अगस्त 2026 को सुबह 09:48 बजे [1]
- राखी बांधने का मुख्य शुभ समय: सुबह 05:57 बजे से सुबह 09:48 बजे तक (कुल अवधि: लगभग 3 घंटे 51 मिनट) [1, 2, 3]
- अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:56 बजे से दोपहर 12:48 बजे तक (यदि सुबह का समय छूट जाए) [1, 2]
- राहुकाल (इस दौरान राखी न बांधें): सुबह 10:46 बजे से दोपहर 12:22 बजे तक
ऐसे हुई थी रक्षाबंधन की शुरुआत
- रक्षाबंधन से जुड़ी द्रौपदी और श्रीकृष्ण की कथा
रक्षाबंधन से जुड़ी इस कथा के अनुसार एक बार भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लग गई थी जिससे लगातार खून बह रह था तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर बांध दिया, जिससे उनका खून बहना रुक गया।
भगवान कृष्ण ने इस प्रेम और विश्वास के बदले द्रौपदी को उनकी रक्षा का वचन दिया। बाद में जब कौरवों ने द्रौपदी का चीरहरण करने की कोशिश की थी तो श्रीकृष्ण ने उनकी रक्षा की थी। यह कथा रक्षाबंधन के रक्षा सूत्र के महत्व को दर्शाती है।
- रक्षाबंधन से जुड़ी इंद्र और इंद्राणी की कथा
भविष्य पुराण के अनुसार जब देवासुर संग्राम में इंद्र असुरों से हार रहे थे, तब उनकी पत्नी इंद्राणी ने एक रक्षा सूत्र तैयार करके इंद्र की कलाई पर बांधा। जिससे इंद्र देव ने युद्ध में विजय प्राप्त की।
कहा जाता है कि इस घटना के बाद से ही रक्षासूत्र बांधने की परंपरा की शुरुआत हुई थी। कालांतर में यह त्योहार भाई-बहनों का त्योहार बन गया। आज के समय में बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उनकी सुरक्षा की कामना करती हैं।
- राखी से जुड़ी राजा बलि और माता लक्ष्मी की कथा
विष्णु पुराण के अनुसार जब भगवान विष्णु ने अपने वामन अवतार में राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी और उनका सारा राज्य ले लिया, तब बलि ने भगवान विष्णु को अपने साथ रहने का अनुरोध किया। तब माता लक्ष्मी ने बलि को राखी बांधकर उन्हें भाई बनाया और श्री हरि विष्णु भगवान को वापस वैकुंठ ले गईं।
- रक्षाबंधन का ऐतिहासिक महत्व
ऐतिहासिक जनश्रुति के अनुसार रानी कर्णावती ने अपने राज्य पर हो रहे आक्रमण से रक्षा करने के लिए मुगल सम्राट हुमायूं को राखी भेजी थी और हुमायूं ने भी इसे स्वीकार कर रानी की रक्षा का वचन दिया था।
हालांकि, वह समय पर नहीं पहुंच सके और रानी कर्णावती ने जौहर कर लिया। लेकिन हुमायूं ने बाद में बहादुर शाह को हराया और विक्रमादित्य को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया।
