देव-डायन युद्ध : घोघर धार में होती है निर्णायक लड़ाई

ये कोई अंधविश्वास की कहानी नहीं, बल्कि लोगों की आस्था से जुड़ी परंपरा है। एक ऐसा खेल जहां आम इंसान नहीं ब्लकि देवता और डायनों में जंग होती है।

जब आसुरी शक्तियां काफी ताकतवर हो जाती हैं और जब बुरी शक्तियों से बचने के लिए लोग घरों से निकलना बंद कर देते हैं। इन दिनों काला महीना चल रहा है। उत्तर भारत में भाद्रपद महीने को काला महीना कहा जाता है। मान्यता है कि काला महीना शुरू होते हैं सभी देवता मंदिरों को छोड़ देते हैंऔर युद्ध में चले जाते हैं।

युद्ध जो कि डायनो के साथ होता हैं। देश के अलग अलग कोनों में। लेकिन निर्णायक लड़ाई होती है हिमाचल के मंडी के पद्धर के घोघरधार में, जहां इन दिनों ये युद्ध लड़ा जा रहा है और ये युद्ध कोई आम युद्ध नहीं होता बल्कि इस युद्ध में फैसला होता है कि आखिर आने वाला साल कैसा रहने वाला है।

क्या फसल अच्छी होगी या बीमारी और प्राकृतिक आपदाओं को प्रकोप रहेगा। एक और इस समय देवताओं और डायनों में युद्ध चल रहा होता है तो दूसरी ओर जादू टोना हावी हो जाता है और इसी जादू टोने का प्रभाव जिस रात सबसे ज्यादा रहता है, उसे कहते हैं डैनी वांस।

हिमाचल प्रदेश के अधिकांश भागों में भादों यानि भाद्रपद की अमावस्या को डैनी वांस के नाम से जाना जाता है। इसे कई जगह डैणवाँस या डुंगवांस भी कहा जाता है।

लोक मान्यता है कि इस दिन डायनें, तांत्रिक, जादू टोना करने वाले, गुर और चेले आदि उपमंडल पद्धर के घोघरधार जाते हैं जहां पर वे देवता और डायनों के बीच अंतिम युद्ध में भाग लेते हैं। डंगवांस पर रात 12 बजे दोनों पक्षों में निर्णायक युद्ध होता है।

इसे डंगवांस के साथ ही अघोरा चतुर्दशी भी कहा गया है। ये कोई अंधिविश्वास नहीं बल्कि सदियों से चली आ रही परंपरा है, जिसके नतीजे मानव जीवन पर असर जरूर डालते हैं, हालांकि सामान्य व्यक्ति इस युद्ध को नहीं देख सकता, बल्कि केवल तांत्रिक या देव परंपराओं से जुड़े गुरु ही इसका अनुभव कर सकते हैं।

ये भी कहा जाता है कि डंगवांस वाले रात जादू टोना, तंत्र जानने वाली महिलाएं तांत्रिक शक्तियां अर्जित करने के लिए उपमंडल पद्धर के घोघरधार पर पहुंचती हैं । डंगवांस पर शाम ढलते ही नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव काफी ज्यादा बढ़ जाता है।

कई लोगों पर नकारात्मक शक्तियों का साया पड़ने से उन्हें डुंगास लगना कहा जाता है। इसके निदान के उपाय भी सुझाए गए हैं। जिन लोगों की आस्था इस युद्ध में हैं वो आज की रात बच्चों और परिवार के लोगों को घर से बाहर नहीं भेजते और अपने घरों में सरसों के अभिमंत्रित दाने घरों की छतों पर रखते हैं और अपने पास भी इन्हें रखा जाता है ताकि बुरे साएं से बचा जा सके।

साथ ही भेखल और टिंबर की टहनियां घरों के दरवाजों और खिड़कियों पर लगाई जाती हैं। माना जाता है कि इससे नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है.सिरमौर, शिमला, मंडी, सोलन और कुल्लू के कुछ ग्रामीण इलाकों में डगयाली को आज भी रहस्य और भय से जुड़ी रात माना जाता है।

वहीं अंतिम और निर्णायक युद्ध घोघरधार में होने के बाद इस युद्ध के विजेता का फ़ैसला पत्थर चौथ के दिन होता है। जिसे हार पासा कहते हैं। इस युद्ध का पूरा हाल नाम नागपंचमी के दिन प्रदेश के विभिन्न मंदिरों में सुनाए जाते हैं।

कौन कितने युद्ध जीता, किसका प्रदर्शन बेहतर रहा, किसे कितनी चोट लगी , सब कुछ। आने वाले दिनों में मंदिरों में सुनाया जाएगा, अब आपके जहन में सवाल होगा कि अगर लड़ाई हो रही है तो रिजल्ट भी आएगा।

कौन जीता कौन हारा इसका फैसला कब सुनाया जाता है। तो आपको बता दें इन दिनों सिर्फ युद्ध चल रहा है देवताओं और डायनों के बीच होने वाले इस युद्ध का परिणाम नवरात्रों में देवी देवताओं के गुर या पुजारी के माध्यम से सुनाया जाता हैं।

कहा जाता है कि अगर देवताओं की जीत हो तो सारा साल सुखमय रहता है, लेकिन फसलों के लिए अच्छा नहीं होता है। वहीं अगर डायनों के जीतने पर जान-माल का नुक़सान होता है, जबकि फसल अच्छी होती है।

फिलहाल किसी की जीत हार का कोई फैसला नहीं हुआ है। लेकिन ये जरूर कहा जा सकता है कि ये मात्र एक त्योहार नहीं बल्कि हिमाचल प्रदेश की समृद्ध संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है। जो आज भी लोगो को उनकी संस्कृति, रीति रिवाज और देवी देवताओं से जोड़ कर रखे हुए हैं।

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