नए मंदिर की प्रतिष्ठा कर विराजे देव पशाकोट

उपमंडल पद्धर की चौहारघाटी के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल देव पशाकोट के 600 वर्ष पुराने मंदिर के स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण किया गया है. गत 15 अप्रैल को तीन सालों से पुरानी सराय में निवास कर रहे देव पशाकोट नए मंदिर का निर्माण पूरा होने पर विधिवत नए मंदिर में विराजमान हो गये. 600 वर्ष पुराने मंदिर का जीर्णोद्वार करके नए मंदिर का निर्माण किया गया है. चौहार समेत पूरे प्रदेश में देव पशाकोट की साक्षात देवता के रूप में लोग पूजा करते हैं।

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चौहारघाटी तरस्वाण पंचायत के मठी बजगैन में स्थित देव पशाकोट के इस मंदिर में 15 अप्रैल सोमवार को विशेष उत्सव ‘देव कारज’ मनाया गया। तीन दिन तक चले महायज्ञ के बाद देव पशाकोट काष्ठशैली से नव निर्मित नए भव्य मंदिर में विराजमान हुए। इस मौके पर हजारों लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। लोगों ने देव पशाकोट की विधिवत पूजा अर्चना कर आशीर्वाद लिया। इस मौके पर भंडारे का भी आयोजन किया गया।


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काष्ठ शैली से निर्मित देवता के नए मंदिर को देवदार व कायल की लकड़ी से बनाया गया है। मंदिर निर्माण पर लगभग 45 लाख खर्च किए गए हैं। इस देव कारज में चौहारघाटी की ग्राम पंचायत लपास, वरधाण, तरसवाण, धमच्याण और लटराण के लोग शामिल हुए।


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इस मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य तीन वर्ष पहले मंदिर कमेटी द्वारा शुरू किया गया था. लोगों के भारी सहयोग तथा कमेटी के अथक प्रयासों से इस निर्माण कार्य को इसी वर्ष पूरा किया गया था. इस मंदिर के निर्माण में देवदार तथा कैल की लकड़ी का प्रयोग किया गया है. धनराशी का प्रबंध कमेटी द्वारा मंदिर के चढ़ावे से तथा लोगों के सहयोग से किया गया है।

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इस मंदिर का निर्माण काष्ठ कुणी शैली से किया गया है। मंदिर के मुख्य दरवाजे पर उकेरे गए भगवान शिव तथा हनुमान के चित्रों की भाग-भंगिमा में इन शक्तियों के साक्षात्कार रूप का आभाष होता है. काष्ठ कला की तमाम आकृतियां बालीचौकी क्षेत्र के रहने वाले कारीगर छरिंद्र कुमार ने बनाई गई है। प्रदेश में अति प्राचीन काष्ठकुणी शैली को जीवीत रखने में अब कुल्लू तथा मंडी जिला के ही कुछ कारीगरों का सहयोग मिल पाता है। इस निर्माण में विशुद्ध रूप से लकड़ी तथा स्थानीय पत्थरों का प्रयोग होता है।

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मंदिर के निर्माण में सामान्य से अधिक समय लगा क्योंकि देव पशाकोट के आदेशों से इस निर्माण में इन कारीगरों को खाली पेट ही कार्य करना पड़ता था. भोजन कर लेने के बाद निर्माण कार्य करने की इजाजत नहीं थी।

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PS – देव पशाकोट के इस सदियों पुराने मंदिर को जाने वाले रास्तों की हालत भी बेहद खस्ता है। थल्टूखोड़ गांव में संस्था के पास से मंदिर को जाने वाले रास्ते का हाल बेहाल है।

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