बैजनाथ शिव मंदिर – मंदिर वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण

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बैजनाथ शिव मंदिर

बैजनाथ १३वीं शताब्दी के बने शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है. बैजनाथ अर्थात “वैद्य + नाथ” जिसका अर्थ है चिकित्सा अथवा ओषधियों का स्वामी. भगवान् शिव, जिन्हें यह मंदिर समर्पित है, को वैद्य + नाथ भी कहा जाता है. यह मंदिर बैजनाथ में पठानकोट-मंडी नेशनल हाईवे के बिलकुल बगल में स्थित है. बैजनाथ का पुराना नाम ‘कीरग्राम’ था परन्तु समय के यह मंदिर के प्रसिद्ध होता गया और ग्राम का नाम बैजनाथ पड़ गया. मंदिर के उतर-पश्चिम छोर पर बिनवा नदी, जो की आगे चल कर ब्यास नदी में मिलती है, बहती है.

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सरंचना और निर्माण कला का उत्कृष्ट नमूना

मंदिर के गर्भ-गृह में प्रवेश एक ड्योढ़ी से होता है जिसके सामने एक बड़ा वर्गाकार मंडप बना है और उत्तर और दक्षिण दोनों तरफ बड़े छज्जे बने है. मंडप के अग्र भाग में चार स्तंभों पर टिका एक छोटा बरामदा है जिसके सामने ही पत्थर के छोटे मंदिर के नीचे नंदी बैल की मूर्ति है. पूरा मंदिर एक ऊंची दीवार से घिरा है और दक्षिण और उत्तर में प्रवेश द्वार हैं . मंदिर की बाहरी दीवारों में मूर्तियों और अन्य आभूषणों को प्रदर्शित करने के लिए बनाये गये झरोखों में कई देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हैं. बहुत सारे चित्र दीवारों में नक़्क़ाशी करके बनाये गये हैं. बरामदे का बाहरी द्वार और गर्भ-गृह को जाता अंदरूनी द्वार अंत्यंत सुंदरता और महत्व को दर्शाते अनगिनत चित्रों से भरा पड़ा है. इनमें से कुछ-एक चित्रों का अन्यत्र मिलना दुर्लभ ही हैं. यह मंदिर पूर्व-मध्ययुगीन उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला की नगाड़ा शैली का एक सुन्दर एवं उत्कृष्ट उदाहरण है

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Baijnath Shiv Temple

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धार्मिक आस्था का केंद्र

बैजनाथ शिव मंदिर दूर-दूर से आने वाले लोगों की धार्मिक आस्था के लिए महत्वपूर्ण स्थान रखता है. यह मंदिर साल भर पूरे भारत और विदेशी पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की एक बड़ी संख्या को आकर्षित करता है. प्रार्थना हर दिन सुबह और शाम में की जाती है. इसके अलावा विशेष अवसरों और उत्सवों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. मकर संक्रांति, महा शिवरात्री, वैशाख संक्रांति, श्रावण सोमवार आदि पर्व भरी उत्साह और भव्यता के साथ मनाऐ जाते हैं. श्रावण मास में पड़ने वाले हर सोमवार को मंदिर में पूजा अर्चना का विशेष महत्व माना जाता है श्रावण मास के सभी सोमवार को मेले के रूप में मनाया जाता है. महा शिवरात्रि पर हर वर्ष पांच दिवसीय राज्य स्तरीय समारोह आयोजित किया जाता है.

Baijnath Shiv Mandir Picture
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दशहरा उत्सव, जो परंपरागत रूप से रावण का पुतला जलाने के लिए मनाया जाता है लेकिन बैजनाथ में इसे रावण द्वारा की गई भगवान शिव की तपस्या ओर भक्ति करने के लिए सम्मान के रूप में मनाया जाता है. बैजनाथ के शहर के बारे में एक और दिलचस्प बात यह है कि यहाँ सुनार की दुकान नहीं है.

खीर गंगा घाट में स्नान का विशेष महत्व

मंदिर के साथ बहने वाली विनवा खड्ड पर बने खीर गंगा घाट में स्नान का विशेष महत्व है श्रद्धालु स्नान करने के उपरांत शिवलिंग को पंचामृत से स्नान करवा कर उस पर विल्व पत्र, फूल, भांग, धतुरा इत्यादि अर्पित कर भोले नाथ को प्रसन करके अपने कष्टों एवं पापों का निवारण कर पुन्य कमाते है.

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रावण ने दी थी दस सिरों की आहुतियाँ

बैजनाथ शिव मंदिर में शिवलिंग स्थापित होने के बारे में कई विचार है. जनश्रुति के अनुसार राम- रावण युद्ध के दौरान रावण ने शिव को प्रसन करने के लिए कैलाश पर्वत पर घोर तपश्या की थी और भगवान शिव को लंका चलने का वरदान माँगा ताकि युद्ध में विजय प्राप्त की जा सके। भगवान शिव ने प्रसन होकर रावण के साथ लंका एक पिंडी के रूप में चलने का वचन दिया और साथ ही यह शर्त रखी की वह इस पिंडी को बिना जमीन में रखे सीधा लंका पहुचाए। जैसे ही शिव की इस अलोकिक पिंडी को लेकर रावण लंका की और रवाना हुआ रास्ते में कोरग्राम (अब बैजनाथ ) नामक स्थान पर रावण को लघुशंका महसूस हुई और उन्होंने वहां खड़े एक व्यक्ति को थोड़ी देर के लिए पिंडी सौंप दी। लघुशंका से निवृत होकर रावण ने देखा की जिस व्यक्ति के हाथ में वह पिंडी दी थी वह ओझल हो चुके हैं और पिंडी जमीन में स्थपित हो चुकी थी। रावण ने स्थापित पिंडी को उठाने के काफी प्रयास किये लेकिन सफलता नही मिल पाई फिर उन्होंने इस स्थली पर घोर तपस्या की और अपने दस सिरों की आहुतियाँ हवन कुंड में डाली। तपस्या से प्रसन होकर रूद्र महादेव ने रावण के सभी सिर पुन: स्थापित कर दिए।

पांडव नही बना पाए थे पूरा मंदिर

द्वापर युग में पांडवों के अज्ञात वास के दौरान इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था। स्थानीय लोगों के अनुसार इस मंदिर का शेष निर्माण कार्य आहुक एवं मनुक नाम के दो व्यापारियों ने 1204 ई. में पूर्ण किया था और तब से लेकर अब तक यह स्थान शिवधाम के नाम से उतरी भारत में प्रसिद्ध है।

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चित्र साभार:
http://www.baijnathtemple.com
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