अज हा पतरोड़ू रा त्योहर, क्या आप जानते हैं इस उत्सव के बारे में ??

जोगिन्दरनगर : आज पतरोड़ू का त्यौहार बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है. हिमाचल प्रदेश में हर गाँव में कोई न कोई उत्सव या त्यौहार मनाया जाता है.

 

भाईचारे को जिन्दा रखते हैं ये उत्सव

आपको याद होगा हमारे बुजुर्गों के समय अगर गाँव में कहीं कोई शादी या कोई उत्सव होता था तो नाशपाती, कचालू (अरबी), सोयाबीन, (कराले) कचनार, सरसों का साग और आम की सब्जी आदि खूब खाने को मिलती थी तथा लोग स्वस्थ भी रहते थे. लेकिन आज के समय में लोग केवल फ़ास्ट फ़ूड तक ही सीमित रह गये हैं तथा इन उत्सवों को भूलते जा रहे हैं. आप में से शायद ही किसी को पता होगा कि पतरोड़ू नाम का भी एक स्थानीय त्यौहार मनाया जा रहा है. 

स्थानीय त्यौहार है “पतरोड़ू”

जिला मंडी में भी हर सक्रांति को वैसे तो पूजा पाठ तो होता ही है लेकिन खासकर बरसात के मौसम में कई त्यौहार हमारे जिला में मनाए जाते है. ये उत्सव हमारी संस्कृति और भाईचारे को आज तक जिन्दा रखे हुए हैं. उत्सव चाहे सुडाणु का हो पतरोड़ू हो या सायर हो हर उत्सव का अपना ही आनंद होता है.

हिमाचली डिश है पतरोड़ू

प्राचीन समय में जब लोग अपने कामों में व्यस्त रहते थे लेकिन इन त्यौहारों का भरपूर आनंद उठाते थे. इन त्यौहारों के बहाने से वे अपनी सेहत का भी ख्याल रखते थे. अपने रिश्ते नातेदारों के पास इन ख़ास दिनों में जरूर जाते थे.उन्हीं त्यौहारों में एक है पतरोड़ू का त्यौहार यानि कचालू के पत्तों से बनाई जाने वाली हिमाचली डिश.

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यह है पतरोड़ू बनाने का तरीका

पतरोड़ू बनाने के कई तरीके हैं पहले तो प्याज व स्वादानुसार मसाला इकठ्ठा मिला कर बेसन के साथ मिला लिया जाता है फिर कचालू के पत्तों में लगाया जाता है. फिर उन्हें गोल गोल पैक कर लिया जाता है फिर पतीले में थोड़ा पानी डाल लिया जाता है उसके बाद उसमें थोड़ी लकड़ी और हल्दी के पत्तों का जाला बनाया जाता है उसके ऊपर पत्तों को रख दिया जाता है और धीमी आंच में पकाया जाता है.

देसी घी या मक्खन के साथ परोसें

कहते हैं इस विधि द्वारा पकाने से पतरोड़े स्वादिष्ट तो होते हैं इसके साथ ही उनकी तासीर ठंडी हो जाती है. दूसरी विधि है पत्तों को कढ़ाही में तेल में पकाने की.पकाने के बाद उसके छोटे -छोटे टुकड़े कर लिए जाते हैं फिर उन्हें देसी घी या मक्खन के साथ खाने का आनंद लिया जा सकता है. पतरोडू को देसी घी और दूध के साथ बड़े ही मजे से खाया जा सकता है.

बुजुर्गों की सेहत का राज होते थे ये उत्सव

हमारे बुजुर्ग कहते हैं कि वे अपने समय में एक आधा किलो देसी घी हजम कर जाते थे क्योंकि वे उतना काम भी तो करते थे. तभी तो हमारे बुजुर्ग स्वस्थ रहते थे कभी कोई बीमारी उनके पास तक नहीं फटकती थी. वर्तमान में चाहे थोड़ा सा ही घी और पतरोड़ू खाएं लेकिन यह त्यौहार जरूर मनाना चाहिए.

लोगों का इन उत्सवों से हो रहा मोह भंग

आज समय के अनुसार लोगों का इन त्यौहारों से मोह भंग हो रहा है क्योंकि लोगों के पास खाने के लिए भी समय नहीं है लोग आज होटलों में खाने को ज्यादा तरजीह देते हैं. लेकिन हमें इन प्राचीन त्यौहारों के लिए थोड़ा समय निकालना चाहिए ताकि हमारी संस्कृति और भाईचारा जिन्दा रह सके.

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